Monday, October 8, 2012

शारीरिक क्षमताओं का विस्तार है इलेक्ट्रानिक मीडिया


लखनऊ 07 अक्टूबर, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश की उत्कृष्ट केन्द्र योजना के अन्तर्गत आज दो दिवसीय इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला का समापन लखनऊ विश्वविद्यालय के ए0पी0 सेन सभागार में हुआ।
कार्यशाला के तृतीय तकनीकी सत्र में साहित्यकार एवं मीडिया विशेषज्ञ उषा सक्सेना ने कहा कि रेडियो शब्दों का माध्यम है जिससे अंधों का थियेटर कहा जाता है। यहां सुनना, देखना, रोना, हंसना सभी क्रियायें, वस्त्र, साज-सज्जा, मौसम शब्दों के द्वारा ही बताये जाते हैं। रेडियो नाटक लिखने के लिए अनिवार्य है कि सर्वप्रथम हम अपने लक्ष्य श्रोताओं के वर्ग विशेष को पहचाने। यह ध्यान रखने योग्य है कि रेडियो पर दृश्य सज्जा का कार्य संगीत और ध्वनि के माध्यम से किया जाता है। अतः दृश्यों को गतिशील बनाने के लिए संगीत का चुनाव आवश्यक है।
मीडिया विशेषज्ञ राकेश निगम ने विकास संचार के बारे में बताते हुए कहा कि आज विकास संचार ने मानव जाति को आधुनिक बना दिया है। मीडिया का सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव होना चाहिए। श्री निगम ने कहा कि कार्यक्रमों के निर्माण में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि कार्यक्रम मनोरंजन के साथ ही साथ शिक्षाप्रद भी प्रदान करे।
दूरदर्शन केन्द्र से आये आत्मप्रकाश मिश्र ने कहा कि कोई भी सामाजिक मुद्दा बिना सामुदायिक सहभागिता के पूरा नहीं किया जा सकता। समाज के निर्माण मंे व्यक्तिगत सहभागिता जरूरी है। लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के लिए शासन और जनता में आपसी संवाद जरूरी है जिसकी जिम्मेदारी दूरदर्शन और आकाशवाणी बखूबी निभा रही है। टी0वी0 के शुरूआती दिनों में सिर्फ 200 सेट थे लेकिन आज प्रत्येक घर में टी0वी0 सेट उपलब्ध हैं लेकिन मीडिया का स्वरूप बदल गया है। पहले जहां सामाजिक सरोकारों से संबंधित खबरों और कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाती थी वहीं आज बलत्कार, हत्या और डकैती जैसे कार्यक्रमों को मनोरंजक तरीके से पेश किया जा रहा है।
दूरदर्शन केन्द्र से आये श्री शिशिर सिंह ने कहा कि दृश्य एवं श्रव्य माध्यम के लेखन का मुख्य उद्देश्य सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन है। इसमें मनोरंजन स्वस्थ्य एवं समाज सापेक्ष होना चाहिए।
दिल्ली से पधारे श्री निमेष कुमार ने बताया कि वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में अपार संभावनायें हैं क्योंकि इसमें विषय विशेषज्ञों की कमी रहती है। अतः जो लोग विज्ञान के क्षेत्र से पत्रकारिता में आये हैं उन्हें विज्ञान पत्रकारिता को अपना आधार बनाना चाहिए जिसमें वह सफल होंगे। विज्ञान लेखन में सहज-स्वभाविक भाषा के अतिरिक्त तकनीकी शब्दावली को सामान्य जन के लिए सुलभ बनाना उनके लिए ही संभव है। हिन्दी में लिखकर ही विज्ञान का प्रचार प्रसार व्यापक रूप से किया जा सकता है। विज्ञान लेखन में सत्य तथ्यों का प्रयोग करें न कि अंधविश्वास पूर्ण कथ्यों का।
कार्यशाला के समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 बी0के0 कुठियाला ने इलेक्ट्रानिक मीडिया की बहुआयामी संभावनाओं पर विचार करते हुए बताया कि इलेक्ट्रानिक मीडिया मनुष्य प्रजाति को मनुष्य बनाने का उपक्रम करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रानिक मीडिया मनुष्य की शारीरिक क्षमताओं का विस्तार है जैसे-दृष्टि का कैमरा, आवाज का रेडियो, स्मृति का कम्प्यूटर। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का उद्देश्य सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की स्थापना होनी चाहिए। इसीलिये आज भौगोलिक एवं भौतिक दूरियां समाप्त करके विश्व ग्राम्य की कल्पना साकार हो रही है। वैज्ञानिकों का दिया हुआ वरदान-इलेक्ट्रानिक संसाधन हमारी मुठ्ठी में है जिसका सदुपयोग मनुष्य और मनुष्यता के विकास के लिए करना चाहिए।
दिल्ली से आये विज्ञापन विशेषज्ञ श्री सुभाष सूद ने इलेक्ट्रानिक मीडिया के विज्ञापनों पर चर्चा करते हुए कहा कि मीडिया पर प्रसारित विज्ञापन बाजार की दृष्टि से सफल हैं किन्तु सामाजिक दृष्टि से वे अपना दायित्व नहीं निभा पा रहे हैं। विज्ञापनों में प्रयुक्त भाषा, चित्र एवं कथानक सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों को विकृत कर रहे हैं। अतः विज्ञापन लिखते समय विशेषज्ञों को वर्ग, बजट, उत्पाद की गुणवत्ता, उत्पादक की लाभ-हानि पर विचार करने के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे विज्ञापन अपना प्रभाव छोड़ सके। इंटरनेट के आने से सोशल मीडिया नेटवर्क विज्ञापन के लिए नया क्षेत्र प्रस्तुत करता है। सेल्यूलर फोनों ने भी विज्ञापन का नया बाजार उपस्थित किया है।
दिल्ली से आये श्री मुकेश कुमार ने प्रतिभागियों से कहा कि जो कुछ सीखा जाए उसे व्यवहारिक रूप में लाना अति आवश्यक है।
कार्यशाला के समापन पर ए0बी0पी0 न्यूज के स्थानीय सम्पादक पंकज झा ने कहा कि मीडिया में जगह बनाने के लिए भाषा का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। हमें शुद्ध उच्चारण पर विशेष ध्यान देना होगा।
इंडिया न्यूज के ब्यूरो प्रमुख श्रेय शुक्ल ने मीडिया के लिए समय की पाबंदी को आवश्यक बताते हुए कहा कि कार्य करते समय वक्त की नजाकत और समय सीमा ही कार्यक्रम को सफल बनाती है। श्री शुक्ल ने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने से समाचारों को प्रस्तुत करने में आसानी हुई है और एक ही व्यक्ति अब कई कार्यों को एक साथ कर लेता है।
कार्यशाला में अतिथियों का स्वागत हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो0 के0डी0 सिंह ने तथा संचालन डाॅ0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी और धन्यवाद ज्ञापन प्रो0 पवन अग्रवाल द्वारा किया गया। दो दिवसीय कार्यशाला की रिपोर्ट डाॅ0 मनोज कुमार द्वारा प्रस्तुत की गई।
दो दिवसीय कार्यशाला में महाराणा इंस्टीट्यूट आॅफ कम्यूनिकेशन स्टडीज से डाॅ0 इन्द्रेश मिश्र, फिल्म इंस्टीट्यूट आॅफ इमिट्स से डाॅ0 पंकज शुक्ल, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग कानपुर विश्वविद्यालय से डाॅ0 रश्मि गौतम, ए0आर0सी0जे0एम0सी0 से विकास सिंह, श्री नारायन इंस्टीट्यूट, जहांगीराबाद मीडिया संस्थान, बाराबंकी, एमिटी विश्वविद्यालय, बी0एस0एन0वी0 पी0जी0 कालेज तथा अन्य कालेजों व विश्वविद्यालयों से प्रशिक्षुओं ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।

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