Sunday, September 16, 2012

जन माध्यमों का चुनाव विज्ञापनों की सबसे बड़ी चुनौती


16 सितम्बर, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश की उत्कृष्ट केन्द्र योजना के अन्तर्गत दो दिवसीय ‘प्रिन्ट मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला’ का समापन आज दिनांक 16 सितम्बर, 2012 को लखनऊ विश्वविद्यालय के ए0पी0 सेन सभागार में किया गया। कार्यशाला के दूसरे दिन विशेषज्ञों ने समाचार लेखन की प्रक्रिया और चुनौतियों पर प्रकाश डाला।
हिन्दुस्तान समूह के एशोसियेट एडीटर श्री हरजिन्दर ने बताया कि समाचार लेखन का कार्य, कहानी लेखन की तरह किया जाता है। कहानी में भी पात्र, परिस्थितियां होती हैं और पत्रकारिता में भी। किन्तु कहानी में कल्पना का तत्व विद्यमान होता है और पत्रकारिता मे यथार्थ का तत्व। समाचार लिखने के लिए अभ्यास करना बहुत आवश्यक होता है। उन्होंने अच्छा समाचार लिखने का तरीका बताते हुए कहा कि ऐसे शब्दों का चुनाव करें जो आठ अक्षरों से अधिक न हों, एक वाक्य में आठ शब्द से अधिक शब्द न हों, एक पैराग्राॅफ में आठ वाक्य से ज्यादा वाक्य न हों तथा एक स्टोरी में आठ पैराग्राफ से ज्यादा पैराग्राफ न हों। हर वाक्य पहले वाक्य से जुड़ा होना चाहिए जिससे निरन्तरता बनी रहे। उन्होंने कहा कि समाचार लेखन के लिए अपने शब्द कोष में वृद्धि करें, जिससे समाचार लिखते समय शब्दों के चयन में असुविधा उत्पन्न न हो। साथ ही शब्द चयन करते समय ध्यान रखें कि पाठक को शब्दकोष न देखना पड़े।
हिन्दुस्तान लखनऊ के विशेष संवाददाता-संतोष वाल्मीकि ने बताया कि पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने से पहले यह तय कर लेना होगा कि हमारी रूचि किन-किन विषयों में है।  एक अच्छा पत्रकार बनने के लिए आवश्यक है कि उन्हीं विषयों का चुनाव किया जाये जिस पर सौ प्रतिशत ध्यान देकर कार्य कर सकें। उन्होंने यह भी बताया कि आज के दौर में ‘जर्नलिज्म’ में बेहतर अवसर उपलब्ध है विशेषकर-‘बिजनेस जर्नलिज्म’ में। श्री वाल्मीकि ने ‘समाचार लेखन’ का विश्लेषण कर उसकी अच्छाइयों और कमियों पर प्रकाश डाला।
हिन्दुस्तान के उप सम्पादक श्री नीरज श्रीवास्तव द्वारा प्रशिक्षुओं को तकनीकी पक्षों की जानकारी दी गयी। उन्होंने समाचार संकलन और समाचारों के चुनाव को बारीकी से समझाया। समाचार लेखन में बहुत से प्रशिक्षुओं ने ‘न्यूज’ को ‘व्यूज’ बना दिया है, जिससे बचना चाहिए। एक अच्छे पत्रकार के लिए आवश्यक है कि पत्रकार लोगों से मिलकर अधिक से अधिक जानकारी जुटाए तभी वह सही बात समाज के सामने रख पायेगा। उन्होंने कहा कि समाचारों में जो लिखा जाए उसमें नवीनता हो, उपयोगी हो तथा उसका प्रस्तुतीकरण ऐसा हो जो पाठकांे में समाचार पढ़ने के लिए उत्सुकता जाग्रत कर सके।

दैनिक जागरण की उपसंपादक सुश्री रोली खन्ना ने समाचार लेखन के लिए सुझाव देते हुए कहा कि समाचार के लिए शीर्षक सबसे महत्वपूर्ण होता है, शीर्षक ही समाचार को पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। समाचार लिखते समय ध्यान रखना चाहिए कि समाचार किसके लिए लिखा जा रहा है और उसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
विज्ञापन विशेषज्ञ श्री सुभाष सूद ने प्रिन्ट मीडिया में क्षेत्रीय विज्ञापनों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 11 सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में एक भी समाचार पत्र अंग्रेजी का नही है जबकि विज्ञापन में हिस्सेदारी 46 प्रतिशत अंग्रेजी, 30 प्रतिशत हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में मराठी 7 प्रतिशत, तमिल 3 प्रतिशत, कन्नड़ 2 प्रतिशत और उडि़या मात्र एक प्रतिशत की हिस्सेदारी करते हैं शेष अन्य भाषाओं के समाचर पत्रों की विज्ञापनों में हिस्सेदारी होती है। उन्होंने कहा कि 2011 के कैलेण्डर ईयर में कुल विज्ञापन 25,000 करोड़ से ज्यादा का था जिसमें 10,800 करोड़ का विज्ञापन प्रिंट मीडिया में था जिसमें इस साल लगभग 9 प्रतिशत वृद्धि की संभावना है। उन्होंने कहा कि जन माध्यमों का चुनाव विज्ञापनों की सबसे बड़ी चुनौती है। मीडिया हो या लोकतंत्र सभी विज्ञापन पर आधारित हो गये हैं। विज्ञापनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पत्रकारिता का क्षेत्र विज्ञापनों में सिमटता जा रहा है। आज लगातार संस्करणों की संख्या मंे बढ़ोत्तरी हो रही है।
श्री सूद ने कहा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में अखबार अपनी पहंुच नहीं बना पा रहे हैं जिससे बहुत सी जानकारियां उन्हें नहीं मिल पाती हैं। उन्होंने कहा कि बड़े अखबारों में विज्ञापनों की कमी नहीं है परन्तु क्षेत्रीय अखबारों को विज्ञापन न के बराबर मिल रहा है जिससे उनके ऊपर वित्तीय संकट बना रहता है। आज युवाओं को लुभाने के लिए अनेक तरह से विज्ञापन बन रहे हैं क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है। श्री सूद ने कामुक विज्ञापनों पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि कुछ विज्ञापन एजेंसियां ऐसी हैं जो उत्पादों की अधिक बिक्री के लिए विज्ञापनों में महिलाओं को कामुक स्थिति में प्रस्तुत कर रही हैं। यह भारतीय समाज के अनुरूप नहीं है। इससे समाज का एक वर्ग दिशाहीन हो रहा है।
कार्यक्रम का संचालन डाॅ0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो0 पवन अग्रवाल ने किया।
कार्यक्रम के दौरान लखनऊ विश्वविद्यालय पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के शिक्षक डाॅ0 मुकुल श्रीवास्तव, महाराणा इंस्टीट्यूट आॅफ कम्यूनिकेशन स्टडीज, कानपुर के विभागाध्यक्ष डाॅ0 इंद्रेश मिश्रा व अन्य पत्रकारिता शिक्षण संस्थानों के शिक्षकगण अपने छात्रों के साथ उपस्थित थे।

Saturday, September 15, 2012

पत्रकारिता शिक्षा समाज को रास्ता दिखाने के लिए है न कि आजीविका के लिए

लखनऊ 15 सितम्बर, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश की उत्कृष्ट केन्द्र योजना के अन्तर्गत आज दिनांक 15 सितम्बर, 2012 को दो दिवसीय ‘प्रिन्ट मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला’ का उद्घाटन लखनऊ विश्वविद्यालय के ए0पी0 सेन सभागार में किया गया।
    उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए हिन्दी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो0 सरला शुक्ल ने कहा कि त्याग और तपस्या का दूसरा नाम ही पत्रकारिता है। स्वतंत्रता के पूर्व से ही हिन्दी पत्रकारिता को बहुत ही संघर्ष करना पड़ा तब आज पत्रकारिता इस आधुनिक स्वरूप में है। पत्रकारिता से ही हिन्दी भाषा का स्वरूप बन और बिगड़ रहा है। आज पत्रकारिता भाषा को नया आयाम देते हुए समाज को नई दिशा दे रही है। पत्रकार का दायित्व सिर्फ सूचना संग्रह करना ही नहीं है उसके द्वारा उसे उचित और अनुचित बातों को अलग करना भी है। पहले पत्रकारिता का व्यावसाय उद्योगपतियों द्वारा किया जाता था परन्तु आज राजनीतिज्ञों द्वारा पत्रकारिता का व्यावसाय किया जा रहा है जिससे पत्रकारिता दिशाहीन हो रही है और निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं हो पा रही है। पत्रकारों को पक्षपात रहित, निर्भीक व निष्पक्ष रह कर पत्रकारिता करनी होगी तभी समाज की सच्ची सेवा हो पायेगी। पत्रकारिता समाज में जागृति लाने का कार्य करती है इसलिए पत्रकार स्वयं अध्ययन कर घटनाओं को समाज के सामने लाए ताकि समाज जागरूक हो सके।
    उन्होंने कहा कि पत्रकारिता सनसनी से नहीं होती है सनसनी तो तात्कालिक होती है जो समाचार पत्रों या समाचार चैनलों को लाभान्वित करती है परन्तु समाज पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है। उन्हांेने नये पत्रकारिता प्रशिक्षुओं से अपील की कि संवेदनशीलता अपनाईये संवेदनहीनता नहीं।
    विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो0 सत्यदेव मिश्र ने कहा कि अतिशीघ्रता में लिखा गया साहित्य ही पत्रकारिता है इसे समझने की जरूरत है। पत्रकारिता के क्षेत्र विस्तृत हैं इसलिए अपने ज्ञान को बढ़ाना होगा किसी एक विषय की जानकारी से पत्रकार नहीं बना जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक क्षेत्र में हो रहे शोधों और सूचनाओं को संग्रह करना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के विषय पर आसानी से लिखा जाए। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में विश्वसनीयता बहुत जरूरी है जिस पर जनता विश्वास कर सके। प्रो0 मिश्र ने कहा कि आज भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर बहुत देर से लिखा जा रहा जबकि पत्रकार अपनी लेखनी से ऐसा जनतंत्र तैयार करें कि नई शासन व्यवस्था सर्वोत्तम हो सके।
    विशिष्ट अतिथि, अमर उजाला, लखनऊ के एशोसियेट एडीटर श्री कुमार भवेश चन्द्र ने कहा कि पत्रकारिता शिक्षा समाज को रास्ता दिखाने के लिए है न कि आजीविका के लिए। यह अन्य विषयों से भिन्न है जो रोजगार देने के साथ ही साथ देश व समाज की सेवा के लिए उपयोगी है। पत्रकारिता करने के लिए ज्ञान का चश्मा लगाकर समाज को पढ़ना होगा।
    उन्होंने प्रशिक्षुओं से कहा कि भाषा को सही तरीके से समझना होगा तभी अपनी बात को स्पष्ट तरीके से लिखा और बोला जा सकता है। श्री चन्द्र ने कहा कि आप सभी लोग डाॅक्टर और इंजीनियर की तरह ही सोशल इंजीनियर बनने जा रहे हैं ताकि समाज का पेंच कस सकें। े हर रोज पढ़ना होगा हर रोज ज्ञान प्राप्त करना होगा तभी आप अच्छे समाज का निर्माण कर पायेंगे।
    मुख्य अतिथि हिन्दुस्तान समूह, नई दिल्ली के एशोसियेट एडीटर श्री हरजिन्दर ने कहा कि आधुनिक तकनीकी के प्रवेश से आज पत्रकारिता का स्वरूप बदल रहा है। प्रतिदिन नये परिवर्तन हो रहे हैं और इसी के कारण आज पत्रकारिता के क्षेत्र मंे नये-नये अवसर आ रहे हैं। आज समाज का स्वरूप लगातार जटिल होता जा रहा है इसलिये समाज को सूचनायें पहुंचाने के लिए ज्यादा से ज्यादा कम्यूनिकेटर की आवश्यकता पड़ रही है इसलिए पत्रकारिता में अवसर की कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि हर पीढ़ी बदलाव के दौर से गुजरती है पहले पत्रकारिता के लिए सिर्फ मुद्रित माध्यमों का ही प्रयोग होता था परन्तु आज विभिन्न इलेक्ट्रानिक माध्यमों के प्रवेश ने पत्रकारिता को और सुलभ बना दिया है। उन्होंने कहा कि इन्हीं बदलावों ने अवसर भी दिये हैं जरूरत है तो सिर्फ अवसरों के पहचान की।
    उन्होंने कहा कि नई तकनीकें कुछ डरा रही हैं पश्चिमी देशों में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का सर्कुलेशन कम हुआ है और टी0वी0, इन्टरनेट और अन्य माध्यमों का प्रभाव बढ़ा है। उन्होंने कहा कि अभी भारत में समाचार पत्रों की स्थिति सही है यहां अभी सर्कुलेशन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है और भविष्य में 20-25 वर्षों तक संभव भी नहीं है।
    हिन्दुस्तान के विशेष संवाददाता श्री संतोष वाल्मीकि ने बताया कि पत्रकारिता चुनौतियों वाली दूनिया है। इसमें पत्रकार समाज के सामने प्रतिदिन परीक्षा देता है क्योंकि पत्रकार प्रत्येक दिन समाज को नई सूचनायें देता है। उन्होंने कहा कि अगर पत्रकारिता में सफल होना है तो अपने दिशा को निर्धारित करना होगा। बिना दिशा तय किये इस क्षेत्र में भटकाव है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता शिक्षा में व्यावहारिक प्रशिक्षण बहुत जरूरी है क्योंकि सिर्फ सर्टिफिकेट से काम नहीं चलेगा।
    हिन्दुस्तान के उप सम्पादक श्री नीरज श्रीवास्तव ने प्रशिक्षुओं को तकनीकी जानकारी दिया। उन्होंने समाचार संकलन, समाचारों के चुनाव आदि पर अपनी बात रखी।
    दैनिक जागरण की उप सम्पादक रोली खन्ना ने बताया कि समाचार पत्र में डेस्क पर राजनीतिक, सामाजिक, क्षेत्रीय समाचार, शासकीय व अन्य क्षेत्रों से संबंधित समाचारों की बहुलता होती है इसलिए डेस्क इंचार्ज के ज्ञान का क्षेत्र विस्तृत होना चाहिए। उन्होंने कहा कि डेस्क पर कार्य करने के लिए अंग्रेजी, हिन्दी के साथ-साथ अन्य भाषाओं का ज्ञान भी आवश्यक है।
    कार्यशाला में प्रो0 के0डी0 सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया व डा0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने कार्यक्रम का संचालन किया। धन्यवाद ज्ञापन डा0 कृष्णा जी श्रीवास्तव द्वारा किया गया।
    कार्यशाला में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के शिक्षक डाॅ0 मुकुल श्रीवास्तव, महाराणा इंस्टीट्यूट आफ कम्यूनिकेशन स्टडीज के विभागाध्यक्ष डा0 इंद्रेश मिश्रा, महाराणा प्रताप एजूकेशनल ग्रुप के डायरेक्टर जनरल श्री आर0एल0एल0 दीक्षित, एमिटि विश्वविद्यालय के शिक्षक संजीव सब्बरवाल, दुर्गेश पाठक व अन्य पत्रकारिता शिक्षण संस्थानों के  शिक्षकगण उपस्थित थे।
    कार्यशाला में लखनऊ, कानपुर व अन्य जिलों के पत्रकारिता विभाग के छात्रों ने भाग लिया।

Friday, September 14, 2012

प्रिन्ट मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला


लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश की उत्कृष्ट केन्द्र योजना के अन्तर्गत दिनांक 15 और 16 सितम्बर 2012 को दो दिवसीय प्रिन्ट मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन विश्वविद्यालय के ए0पी0 सेन सभागार में किया जा रहा है।
प्रिन्ट मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला का स्वागत भाषण प्रो0 कैलाश देवी सिंह अध्यक्ष हिन्दी विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ द्वारा किया जायेगा। कार्यशाला में मुख्य अतिथि का उद्बोधन श्रीयुत् नवीन जोशी कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, विशिष्ट अतिथि का उद्बोधन श्री हरजिन्दर, एसोसिएट एडीटर, हिन्दुस्तान समूह, नई दिल्ली तथा विशिष्ट समागत-श्रीयुत् दिलीप अवस्थी, स्थानीय, संपादक दैनिक जागरण लखनऊ और अध्यक्षीय उद्बोधन-प्रो0 सरला शुक्ल, पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ द्वारा किया जायेगा।
कार्यशाला के माध्यम से प्रिन्ट मीडिया की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग ने ‘प्रिन्ट मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला’ का आयोजन किया है। जीवन के हर क्षेत्र मंे मीडिया प्रसंागिक हो गया है, इसलिए प्रिन्ट मीडिया की सम्यक समझ हेतु क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से प्रिन्ट मीडिया का प्रचार-प्रसार अति आवश्यक होता जा रहा हैं। प्रिन्ट मीडिया का हमारी संस्कृति और भाषा से गहरा सम्बन्ध है, जिसके कारण इसका महत्व दिनांे-दिन बढ़ता जा रहा है। समस्त मीडिया कर्मियों का यह प्रथम दायित्व है कि प्रिन्ट मीडिया को सरल ढंग से आम जनता तक पहुँचाएं। परिणाम स्वरूप प्रिन्ट मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन क्षेत्रीय भाषाओं में अनिवार्य हो गया है।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रिन्ट मीडिया का प्रचार-प्रसार, क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षण व्यवहारिक रूप से दिया जाय। इस कार्यशाला के प्रथम सत्र 15 सितम्बर 2012 विषय ‘समाचार लेखन प्रक्रिया’ के लिए विशेषज्ञ- श्री हरजिन्दर: एसोशिएट एडीटर, हिन्दुस्तान समूह, नई दिल्ली, श्री दिलीप अवस्थी: स्थानीय संपादक, दैनिक जागरण, लखनऊ, श्री संतोष वाल्मीकि: विशेष संवाददाता, हिन्दुस्तान, लखनऊ, श्री नीरज श्रीवास्तव: उपसंपादक, हिन्दुस्तान लखनऊ, द्वारा प्रशिक्षण प्रदान करेंगे।

Wednesday, September 5, 2012

पी-एच0डी0 की मौखिकी सम्पन्न

03 सितम्बर, 2012। हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय में श्री शोभालाल मौर्या की पी-एच0डी0 की मौखिक परीक्षा सम्पन्न हो गया। मौर्या जी ने ‘गुरु प्रसाद सिंह ‘मृगेश’ के काव्य में लोक संस्कृति’ विषय पर प्रो0 हरिशंकर मिश्र के निर्देशन में अपना शोध कार्य पूर्ण किया।

Sunday, September 2, 2012

अभिव्यक्ति का सर्वोच्च माध्यम हिन्दी भाषा

लखनऊ: 02 सितम्बर, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग ने उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन की ‘‘उत्कृष्ट केन्द्र योजना’’ के अंतर्गत आयोजित दो दिवसीय ‘हिन्दी में विज्ञान लेखन’ कार्यशाला के दूसरे दिन तृतीय सत्र मंे प्रो0 कृष्ण गोपाल दुबे ने हिन्दी में वैज्ञानिक शोध लेखन तकनीक के बारे में बताते हुए कहा कि शोध लेखन में वैज्ञानिक सोच होना बहुत आवश्यक है बिना इसके किसी भी शोध में प्रमाणिकता नहीं आ सकती है। विषयों मंे व्यापकता बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि विज्ञान में शोध हेतु विषयों की व्यापकता है किन्तु वह हिन्दी में नहीं है जिसके कारण आम जनमानस के बीच उपस्थित नहीं है।     प्रो0 दुबे ने कहा कि सोच समझकर लिखना चाहिए नहीं तो शब्दों का गलत अर्थ वाक्य को गलत कर देगा। देश में 90 प्रतिशत लोग हिन्दी जानते हैं फिर भी हम भरोसा अमेरिका पर करते हैं यह दुखद है। उन्होंने कहा कि विज्ञान में विषयों की भरमार है जिससे शोधार्थी को विषय के चयन में सहजता रहती है और शोध करने मंे किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती। उन्होंने कहा कि शोध पत्र मंे सारांश जरूरी है क्यांेकि सारांश में शोध से संबंधित पूर्ण जानकारी समाहित होती है।
    डाॅ0 सी0एम0 नौटियाल ने मीडिया में विज्ञान लेखन को बताते हुए कहा कि विज्ञान संप्रेषण मंे समझाने और लेखन की समस्या है। विज्ञान में आंकड़ों का महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन लेखन में आंकड़ों को सरल ढंग से प्रस्तुत करना चाहिए। विज्ञान बहुत नीरस और शुष्क विषय माना जाता है इसलिए आम आदमी के लिए विज्ञान को सरलता और रोचकता के साथ लिखा जाना चाहिए। लेखन किसी भी माध्यम के लिए हो लेकिन अभिव्यक्ति सुस्पष्ट होनी चाहिए। वैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग आमजन के अनुकूल होना चाहिए। भाषा शैली का प्रयोग प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया या लोक माध्यम को ध्यान में रखकर करना चाहिए। तकनीकी मामलों में अभिव्यक्ति बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए। विज्ञान को न समझने वाले या तो उसकी हंसी उड़ाते हैं या डरते हैं। डाॅ0 नौटियाल ने कहा कि प्रसिद्ध जनमाध्यम रेडियो के कार्यक्रमों में वार्ता-संगोष्ठी, परिसंवाद, पहेली, नाटक एवं प्रहसन आदि में वैज्ञानिक सोच पर बल दिया जाना चाहिए। विज्ञान लेखन केवल अंग्रेजी के माध्यम से ही नहीं बल्कि हिन्दी की कविताओं के माध्यम से भी किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि लिखने में रोचकता हो तो वह पठनीय होता है इसीलिए रेडियो लेखन रोचक होना चाहिए। रेडियो में सीमायें हैं इसमें शब्द चित्र का रूप धारण कर श्रोताओं को समझाता है। डाॅ0 नौटियाल ने कहा कि विज्ञान लेखन में उच्चारण का विशेष महत्व है अगर उच्चारण गलत हो जाये तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। हिन्दी भाषियों के संख्या अधिक है अगर हिन्दी में लिखा जाए तो ज्यादा से ज्यादा व्यक्तियों तक पहंुच बनायी जा सकती है।
    प्रो0 ए0के0 शर्मा ने कहा कि हिन्दी की स्थिति बहुत अच्छी है। हिन्दी दिल और दिमाग की भाषा है। यह जन सामान्य की भाषा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अभिव्यक्ति का सर्वोच्च माध्यम हिन्दी भाषा ही है। विज्ञान की स्थिति भी बहुत सशक्त है लेकिन जब इसे हिन्दी में लिखते हैं तो बहुत कठिन हो जाता है। विज्ञान लेखन में सरलता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जहां तक संभव हो अन्तर्राष्ट्रीय शब्दों को उनके वर्तमान अंग्रेजी स्वरूप में प्रयोग करना चाहिए एवं हिन्दी व अन्य भाषा में उनके जातिय रूप में अनुवाद करना चाहिए। प्रो0 शर्मा ने कहा कि वैज्ञानिक साहित्यकार नहीं होते और साहित्यकार वैज्ञानिक नहीं होते अगर दोनों में सामन्जस्य हो तो विज्ञान को हिन्दी में लिखना कठिन न होगा। उन्होंने कहा कि कुछ सामान्य वैज्ञानिक शब्द जो पहले से प्रचलित हैं उनका अनुवाद नहीं करना चाहिए। अनुवाद करने से उनका अर्थ बदल सकता है।
    कार्यशाला के चैथे सत्र में प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुए डाॅ0 जाकिर अली रजनीश ने कहा कि नये जनसंचार माध्यम ब्लाग के माध्यम से विज्ञान को हिन्दी में लिखकर प्रचारित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज दो दर्जन से अधिक ऐसे ब्लाॅगर हैं जो हिन्दी में विज्ञान लेखन का कार्य कर रहे हैं। आने वाला समय इंटरनेट का है इसलिए हिन्दी में विज्ञान लेखन को और प्रोत्साहन मिलेगा। हिन्दी मंे विज्ञान कथा का 100 साल से भी अधिक का इतिहास है। उन्होंने कहा कि 1989 मंे हिन्दी भाषा में पहली विज्ञान कहानी टिंकल में छपी। राहुल सांस्कृत्यायन, नवल बिहारी मिश्र, राजेश गंगवार, हरीश गोपाल आदि विज्ञान कथा के लेखक हैं जिन्होंने विज्ञान को हिन्दी में लिखकर प्रचारित किया है। अंधविश्वासों को दूर करने में भी विज्ञान लेखन आवश्यक है। उन्होंने कहा विज्ञान कथा लिखने हेतु प्रमाणिकता की बहुत जरूरत है इससे विज्ञान की सत्यता पुष्ट होती है।
    डाॅ0 ध्रुवसेन सिंह ने कहा कि हिन्दी साहित्यकारों की बातें पूर्णतः वैज्ञानिक हैं। साहित्यकार तो युगदृष्टा है वह भविष्य की बातों को अपने साहित्य में प्रकट करता है। प्रकृति तो परिवर्तनशील है। इस संदर्भ में उन्होंने प्रसाद की कामायनी का जिक्र करते हुए हिमनदों के भविष्य पर चिन्ता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि प्रकृति मानव नियंत्रण से परे है जब इस पृथ्वी पर मनुष्य नहीं था तब भी प्रकृति में अनेक प्रकार के परिवर्तन हुए हैं। यदि प्रकृति मानव के नियंत्रण में होती या उनके क्रिया कलाप से प्रकृति के स्वरूप में परिवर्तन होता तो निश्चय ही बाढ़ और सूखा जैसी समस्याओं से अभितक मानव को मुक्ति मिल चुकी होती। उन्होंने कहा कि जिन सभ्यताओं का विकास अधिक हो जाता है वह शीघ्र नष्ट हो जाती है, ऐसा कई बार पृथ्वी पर हुआ है। उन्होंने पेड़-पौधों को पर्यावरण का थर्मामीटर बताते हुए कहा कि ये प्रकृति पर नियंत्रण रखते हैं। नदियां धर्म, आस्था और संस्कृति का प्रतीक हैं। परिवर्तन हेतु प्रकृति स्वंय जिम्मेदार है वह अपना विकास और विनाश स्वयं करती है। इसके लिए मनुष्य जिम्मेदार नहीं है।
    प्रो0 नदीम हसनैन ने हिन्दी में मानव विज्ञान लेखन की समस्याएं एवं सम्भावनाएं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भाषा और शब्दावली पर्याप्त है परन्तु इस पर कार्य करने वाले लोगों की कमी है। मानव से हमारी कहानी शुरू होती है और मानव पर ही समाप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि शारीरिक या जैविक विज्ञान को हिन्दी में लिखने में समस्याएं आती हैं लेकिन समस्याओं से मुकाबला कर लिखना चाहिए। हिन्दी के शब्द क्लिष्ट जरूर हैं लेकिन शब्द अच्छे हैं और लिखने के लिए शब्दावली बेहतर होनी चाहिए। इसी से मौलिक लेख को लिखा जा सकता है। प्रो0 हसनैन ने एस0एम0एस0 पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज युवाओं ने शार्टकट लिखने के चक्कर में शब्दों के स्वरूप को ही बिगाड़ दिया है जिससे हिन्दी तथा अंग्रेजी में संक्रमण हो गया है। अब पता ही नहीं चलता कि उसे हिन्दी में पढ़ें या अंग्रेजी में।
    कार्यशाला के समापन की अध्यक्षता करते हुए प्रति कुलपति प्रो0 यू0एन0 द्विवेदी ने कहा कि विज्ञान लेखन में क्लिष्ट भाषा की जगह सर्वप्रचलित सामान्य भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपनी मातृ भाषा में सोचता है और उसी में विचार अभिव्यक्त करता है किन्तु विडम्बना है कि भारत में विज्ञान अंग्रेजी में ही सोचा समझा जा रहा है।
    कार्यशाला के मुख्य अतिथि प्रो0 भूमित्र देव ने कहा कि विज्ञान विषद है सकरा नहीं यह किसी भी विषय में प्रवेश कर सकता है अगर उसका इंतजार किया जाये तो। दुखद है कि युवा वर्ग की मातृ भाषा मंे बहुत अरूचि हो गई है। आज के युग में आधुनिकता की आवश्यकता है परन्तु मातृभाषा का दर्द भी है जिसे युवा अपना नहीं रहे हैं। देश का मूल संविधान भी अंग्रेजी में है जिसे आम व्यक्ति पढ़ नहीं सकता। उन्होंने कहा कि 2012 में विश्वभर में प्रतिवर्ष पढ़ने की दर का अध्ययन किया गया कि कितने लोग पढ़ने में रूचि रखते हैं उसमें भारत 72 वें स्थान पर है इससे साफ जाहिर होता है कि भारत में अब लोगों की पढ़ने में रूचि कम हो रही है। शब्द तो सरोवर में डूबी हुई सीढ़ी की तरह है जिसे मनुष्य ज्ञान द्वारा अर्जित कर आगे बढ़ सकता है। प्रो0 देव ने कहा कि नये शब्दों की रचना पर विचार करना होगा, नये शब्दों को गढ़ना होगा तभी राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश को पहचान मिल सकती है। अगर कोई विद्वान विश्वस्तर पर अच्छा ज्ञान अर्जित करना चाहता है तो उसे एक-एक शब्द को ध्यान से पढ़ना और समझना होगा। यह विकास का मुद्दा हो सकता है। नये शब्दों की गुणवत्ता तथा नये रचे गये शब्द राष्ट्रीय विकास के तथ्यों को नापने का पैमाना हो सकता है। उन्होंने कहा कि अधिकांश नये शब्द हमारे पढ़े लिखे लोगों द्वारा कम रचे गये हैं लोक रचित ज्यादा हैं। आम व्यक्तियों ने हिन्दी में शब्दों की रचना की है। आज सार्थक मौलिक विज्ञान लेखन की सत्त आवश्यकता है। भाषा में जो रस है भाषाविदों को समझना और समझाना होगा।
    प्राचीन इतिहास के पूर्व डीन कला संकाय प्रो0 शिवनन्दन मिश्र ने कहा कि विज्ञान को जनसमान्य तक ले जाने के लिए विद्वानों और शिल्पियों को एक साथ बैठाकर शब्दों का गठन हिन्दी में करना होगा तभी विज्ञान जन-जन तक पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि प्रायोगिक विज्ञान, शिल्पियों के पास है और शस्त्रीय ज्ञान विद्वानों के पास इसलिए अपने यहां हिन्दी में विज्ञान लेखन की परम्परा विकसित नहीं हो पायी।
    इसके पूर्व कार्यशाला में आये अतिथियों का स्वागत हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो0 कैलाश देवी सिंह ने पुष्पगुच्छ देकर किया। कार्यक्रम का संचालन डाॅ0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो0 पवन अग्रवाल द्वारा किया गया। कार्यशाला में हिन्दी विभाग के अध्यापक, छात्र और कर्मचारीगण मौजूद रहे।

Saturday, September 1, 2012

विज्ञान और हिन्दी के सामन्जस्य से ही आम व्यक्ति का विकास संभव

                                          
लखनऊ : 18 अगस्त, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग ने उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन की ‘‘उत्कृष्ट केन्द्र योजना’’ के अंतर्गत दो दिवसीय ‘हिन्दी में विज्ञान लेखन’ कार्यशाला का उद्घाटन आज ए0पी0 सेन सभागार मंे हुआ।
    कार्यशाला का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। अतिथियों का स्वागत हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो0 कैलाश देवी सिंह ने पुष्पगुच्छ देकर किया। कार्यक्रम का संचालन डाॅ0 हेमांशु सेन ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन डाॅ0 रविकान्त ने किया।
    उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 मनोज कुमार मिश्र ने कहा कि विश्वविद्यालयों के अधिकतर छात्र हिन्दी माध्यम से होते हैं, उनके लिए हिन्दी लेखन की बहुत आवश्यकता है। प्रो0 मिश्र ने कहा कि हिन्दी के विद्यार्थी हिन्दी में ही सोचते और समझते हैं अतः आवश्यकता इस बात की है कि उन छात्रों के लिए विज्ञान की पुस्तकें हिन्दी में लिखी जाएं। उन्होंने कहा कि विज्ञान ही हमारे देश को आगे ले जायेगा। ग्रामीण क्षेत्र के बहुतेरे ऐसे छात्र हैं जो अंग्रेजी से दूर भागते हैं जिन्हें अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है उनके लिए विज्ञान की पुस्तकों को हिन्दी में लिखा जाना चाहिए जो पढ़ने में रोचक हो और साथ ही ज्ञानपरक भी। विज्ञान और हिन्दी के सामन्जस्य से ही आम व्यक्ति भी विज्ञान को आसानी से समझ सकता है। प्रो0 मिश्र ने कहा कि विदेशों में विज्ञान को उनके मातृभाषा में पढ़ाया जाता है जबकि हिन्दुस्तान में ऐसा नहीं है तभी आज विज्ञान समाज की पहुंच से बाहर है। भाषा के विवाद के कारण ही आज विज्ञान का सम्पूर्ण विकास नहीं हो पा रहा है।
    कार्यशाला के मुख्य अतिथि, लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति पद्मश्री प्रो0 महेन्द्र सिंह सोढ़ा ने कहा कि स्वतंत्रता के 65 वर्षों बाद भी विज्ञान को हिन्दी मंे लिखने की चर्चा करना चिंताजनक है। सरकार ने इस ओर विशेष ध्यान दिया होता तो आज तस्वीर कुछ और होती। उन्होंने कहा कि  किसी लेखक के कलम को विज्ञान में हिन्दी लेखन कार्य हेतु सरकार ने नहीं रोका था फिर भी आज बाजार में विज्ञान की हिन्दी में लिखी किताबें प्रचुर मात्रा मंे उपलब्ध नहीं है। इसलिए दोष लेखक और सरकार दोनों का है। प्रो0 सोढ़ा ने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि स्कूल और कालेज स्तर से ही विज्ञान को हिन्दी में पढ़ाया जाय। परन्तु दुखद है कि आज स्कूल और कालेज दोनों ही स्तर पर विज्ञान को हिन्दी लेखन स्तर पर कार्य नहीं हुआ है। स्नातक स्तर पर तो विज्ञान की किताबें हिन्दी में मिलती हीं नहीं है जिससे अंग्रेजी में कमजोर छात्र बहुत पीछे रह जाते हैं। शोध तो पूरी तरह से अंग्रेजी में ही होता है जो सबसे बड़ी चुनौती है। आज आवश्यकता है कि जनसाधारण के लिए उन्हीं की भाषा में किताबें लिखी जायें ताकि विज्ञान लोकप्रिय हो सके। देश में लेखन परीक्षा को ध्यान मंे रखकर किया जाता है जबकि विषयानुसार लेखन कार्य कम हुआ है।
    विषय प्रवर्तन करते हुए हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित ने कहा कि हिन्दी के समक्ष जो सबसे बड़ी चुनौती है वह है ज्ञान-विज्ञान का लेखन। आज विज्ञान और तकनीकी का युग है। सर्जनात्मक लेखन का महत्व अलग है। हमारे अंदर ज्ञान की कमी नहीं है, संसाधनों की भी कमी नहीं है कमी है तो इच्छाशक्ति की। उन्हांेने कहा कि अंग्रेजी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें ज्ञान-विज्ञान की नवीनतम सामग्री अपडेट होती रहती है जबकि हिन्दी में नहीं। प्रो0 दीक्षित ने कहा कि आज गरीब तबके या मध्यम वर्ग के बहुत से बच्चे जो अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा नहीं ग्रहण कर पाते ऐसा नहीं है कि उनमें ज्ञान की कमी है, सोचने की क्षमता नहीं है कमी है तो सिर्फ माध्यम की। वे विज्ञान की मूल बातों को अंग्रेजी में नहीं समझ पाते हैं, इसके लिए आवश्यकता है कि विज्ञान को अपनी भाषा मंे सीखें जिसके लिए हिन्दी में विज्ञान लेखन आवश्यक है।
    कार्यशाला के प्रथम सत्र में प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डाॅ0 जयेन्द्र कुमार चैधरी ने कहा कि विज्ञान कठिन और अरूचिकर विषय है इसे अपने भाषा में ही लिखने और पढ़ने में रूचि पैदा होगी। आज देश के 90 प्रतिशत लोग हिन्दी बोल और समझ सकते हैं इसलिए अगर विज्ञान को हिन्दी में लिखा जाये तो कोई परेशानी नहीं है। डाॅ0 चैधरी ने कहा कि वैज्ञानिकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे अनुसंधान आम जनमानस के लिए कर रहे हैं इसलिए शोध को हिन्दी में लिखें ताकि उसके बारे में सभी लोग समझ सकें। उन्होंने कहा कि चीन और जापान आदि देशों में उनके सभी शोध पत्र उनकी मातृ भाषा में छपते हैं, हमारे यहां उनके अनुवाद पर हजारों रूपये खर्च करने पड़ते हैं परन्तु हमारे देश में विपरीत स्थिति है। यहां शोध पत्र को अंग्रेजी में छापा जाता है जिसका संबंध आम आदमी से होता ही नहीं है। उन्होंने कहा कि हम शोध किसानों के लिए करते हैं अगर इसको अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित कराते हैं तो किसान कैसे पढ़ पायेगा और कैसे अपने फसल की सुरक्षा कर पायेगा। सबसे अहम बात यह है कि अगर वैज्ञानिक शोध को अंग्रेजी में लिखकर किसी अच्छे जर्नल में न छपवाये तो उसके आजीविका पर संकट आ जायेगा अतः आवश्यकता है कि इस ओछी मानसिकता से बाहर आकर शोध को हिन्दी में लिखा जाये और उसी भाषा में प्रकाशित किया जाये।
    सी0डी0आर0आई0 के वैज्ञानिक डाॅ0 प्रदीप श्रीवास्तव ने अपने सम्बोधन में कहा कि भाषा महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है ज्ञान। यदि किसी व्यक्ति के पास ज्ञान है तो वो किसी भी जगह जा सकते हैं। डाॅ0 श्रीवास्तव ने जैव विविधिता को कार्टूनों द्वारा समझाया ताकि आम व्यक्ति उसके उपयोग को अच्छी तरह समझ सके। हमारे देश में 16 ऐसे डायवर्सिटी जोन हैं जहां अलग-अलग मौसम हैं।
    डाॅ0 महेन्द्र प्रताप सिंह ने हिन्दी मंे पर्यावरण लेखन पर बताया कि पर्यावरण को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। किसी एक विभाग या संस्था पर इसे नहीं छोड़ा जा सकता है। देश के सभी व्यक्तियों को मिलकर इस पर कार्य करना चाहिए। कोई दैवीय शक्ति स्वयं आकर इसका निदान नहीं करेगी। डाॅ0 सिंह ने कहा कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए पाॅलीथिन आदि का प्रयोग बंद कर देना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिबद्ध होकर पेड़ लगाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा संख्या में वृक्ष हों जिससे पर्यावरण की सुरक्षा की जा सके। प्राचीन ग्रंथों रामचरितमानस, रामायण आदि ग्रंथों में भी वृक्षों का उल्लेख है।

    कार्यशाला में डाॅ0 आनन्द कुमार अखिला ने स्वास्थ्य और प्रसन्नता विषय पर बताते हुए बहुत से ऐसे पौधों, मसालों आदि के विषय में बताया जिनका प्रयोग सामान्य जीवन में हम करते अवश्य हैं किन्तु उनके उपयोगी तथ्यों की जानकारी नहीं होती। तुलसी, हल्दी, दालचीनी आदि के जीवन में बहुत से प्रयोग हैं। उन्होंने कहा कि विज्ञान हमारी भाषा से काफी दूर है। विज्ञान को आम जनमानस के करीब लाने के लिए उसे मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत करना होगा।