Sunday, September 16, 2012

जन माध्यमों का चुनाव विज्ञापनों की सबसे बड़ी चुनौती


16 सितम्बर, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश की उत्कृष्ट केन्द्र योजना के अन्तर्गत दो दिवसीय ‘प्रिन्ट मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला’ का समापन आज दिनांक 16 सितम्बर, 2012 को लखनऊ विश्वविद्यालय के ए0पी0 सेन सभागार में किया गया। कार्यशाला के दूसरे दिन विशेषज्ञों ने समाचार लेखन की प्रक्रिया और चुनौतियों पर प्रकाश डाला।
हिन्दुस्तान समूह के एशोसियेट एडीटर श्री हरजिन्दर ने बताया कि समाचार लेखन का कार्य, कहानी लेखन की तरह किया जाता है। कहानी में भी पात्र, परिस्थितियां होती हैं और पत्रकारिता में भी। किन्तु कहानी में कल्पना का तत्व विद्यमान होता है और पत्रकारिता मे यथार्थ का तत्व। समाचार लिखने के लिए अभ्यास करना बहुत आवश्यक होता है। उन्होंने अच्छा समाचार लिखने का तरीका बताते हुए कहा कि ऐसे शब्दों का चुनाव करें जो आठ अक्षरों से अधिक न हों, एक वाक्य में आठ शब्द से अधिक शब्द न हों, एक पैराग्राॅफ में आठ वाक्य से ज्यादा वाक्य न हों तथा एक स्टोरी में आठ पैराग्राफ से ज्यादा पैराग्राफ न हों। हर वाक्य पहले वाक्य से जुड़ा होना चाहिए जिससे निरन्तरता बनी रहे। उन्होंने कहा कि समाचार लेखन के लिए अपने शब्द कोष में वृद्धि करें, जिससे समाचार लिखते समय शब्दों के चयन में असुविधा उत्पन्न न हो। साथ ही शब्द चयन करते समय ध्यान रखें कि पाठक को शब्दकोष न देखना पड़े।
हिन्दुस्तान लखनऊ के विशेष संवाददाता-संतोष वाल्मीकि ने बताया कि पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने से पहले यह तय कर लेना होगा कि हमारी रूचि किन-किन विषयों में है।  एक अच्छा पत्रकार बनने के लिए आवश्यक है कि उन्हीं विषयों का चुनाव किया जाये जिस पर सौ प्रतिशत ध्यान देकर कार्य कर सकें। उन्होंने यह भी बताया कि आज के दौर में ‘जर्नलिज्म’ में बेहतर अवसर उपलब्ध है विशेषकर-‘बिजनेस जर्नलिज्म’ में। श्री वाल्मीकि ने ‘समाचार लेखन’ का विश्लेषण कर उसकी अच्छाइयों और कमियों पर प्रकाश डाला।
हिन्दुस्तान के उप सम्पादक श्री नीरज श्रीवास्तव द्वारा प्रशिक्षुओं को तकनीकी पक्षों की जानकारी दी गयी। उन्होंने समाचार संकलन और समाचारों के चुनाव को बारीकी से समझाया। समाचार लेखन में बहुत से प्रशिक्षुओं ने ‘न्यूज’ को ‘व्यूज’ बना दिया है, जिससे बचना चाहिए। एक अच्छे पत्रकार के लिए आवश्यक है कि पत्रकार लोगों से मिलकर अधिक से अधिक जानकारी जुटाए तभी वह सही बात समाज के सामने रख पायेगा। उन्होंने कहा कि समाचारों में जो लिखा जाए उसमें नवीनता हो, उपयोगी हो तथा उसका प्रस्तुतीकरण ऐसा हो जो पाठकांे में समाचार पढ़ने के लिए उत्सुकता जाग्रत कर सके।

दैनिक जागरण की उपसंपादक सुश्री रोली खन्ना ने समाचार लेखन के लिए सुझाव देते हुए कहा कि समाचार के लिए शीर्षक सबसे महत्वपूर्ण होता है, शीर्षक ही समाचार को पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। समाचार लिखते समय ध्यान रखना चाहिए कि समाचार किसके लिए लिखा जा रहा है और उसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
विज्ञापन विशेषज्ञ श्री सुभाष सूद ने प्रिन्ट मीडिया में क्षेत्रीय विज्ञापनों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 11 सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में एक भी समाचार पत्र अंग्रेजी का नही है जबकि विज्ञापन में हिस्सेदारी 46 प्रतिशत अंग्रेजी, 30 प्रतिशत हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में मराठी 7 प्रतिशत, तमिल 3 प्रतिशत, कन्नड़ 2 प्रतिशत और उडि़या मात्र एक प्रतिशत की हिस्सेदारी करते हैं शेष अन्य भाषाओं के समाचर पत्रों की विज्ञापनों में हिस्सेदारी होती है। उन्होंने कहा कि 2011 के कैलेण्डर ईयर में कुल विज्ञापन 25,000 करोड़ से ज्यादा का था जिसमें 10,800 करोड़ का विज्ञापन प्रिंट मीडिया में था जिसमें इस साल लगभग 9 प्रतिशत वृद्धि की संभावना है। उन्होंने कहा कि जन माध्यमों का चुनाव विज्ञापनों की सबसे बड़ी चुनौती है। मीडिया हो या लोकतंत्र सभी विज्ञापन पर आधारित हो गये हैं। विज्ञापनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पत्रकारिता का क्षेत्र विज्ञापनों में सिमटता जा रहा है। आज लगातार संस्करणों की संख्या मंे बढ़ोत्तरी हो रही है।
श्री सूद ने कहा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में अखबार अपनी पहंुच नहीं बना पा रहे हैं जिससे बहुत सी जानकारियां उन्हें नहीं मिल पाती हैं। उन्होंने कहा कि बड़े अखबारों में विज्ञापनों की कमी नहीं है परन्तु क्षेत्रीय अखबारों को विज्ञापन न के बराबर मिल रहा है जिससे उनके ऊपर वित्तीय संकट बना रहता है। आज युवाओं को लुभाने के लिए अनेक तरह से विज्ञापन बन रहे हैं क्योंकि उनकी संख्या ज्यादा है। श्री सूद ने कामुक विज्ञापनों पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि कुछ विज्ञापन एजेंसियां ऐसी हैं जो उत्पादों की अधिक बिक्री के लिए विज्ञापनों में महिलाओं को कामुक स्थिति में प्रस्तुत कर रही हैं। यह भारतीय समाज के अनुरूप नहीं है। इससे समाज का एक वर्ग दिशाहीन हो रहा है।
कार्यक्रम का संचालन डाॅ0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो0 पवन अग्रवाल ने किया।
कार्यक्रम के दौरान लखनऊ विश्वविद्यालय पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के शिक्षक डाॅ0 मुकुल श्रीवास्तव, महाराणा इंस्टीट्यूट आॅफ कम्यूनिकेशन स्टडीज, कानपुर के विभागाध्यक्ष डाॅ0 इंद्रेश मिश्रा व अन्य पत्रकारिता शिक्षण संस्थानों के शिक्षकगण अपने छात्रों के साथ उपस्थित थे।

No comments:

Post a Comment