Saturday, April 11, 2015

वैचारिकता की ओर ले जाने वाले रचनाकार हैं राहुल सांकृत्यायन

राहुल सांकृत्यायन न सिर्फ हिन्दी साहित्य और भारतीय साहित्य अपितु विश्व साहित्य में मौलिक चिन्तन, सृजनशीलता एवं भविष्यद्रष्टा के रूप में जाने जाते हैं। मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए उक्त विचार जाने माने पर्यावरणविद् वरिष्ठ आचार्य और कहार पत्रिका के संपादक डाॅ0 आर0 पी0 सिंह ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा। आगे बोलते हुए प्रो0 सिंह ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन कामकाजी फलक से  वैचारिकता की ओर ले जाने वाले रचनाकार हैं। विज्ञान प्रत्यक्ष रूप से मानव समाज से जुड़ा हुआ है और साहित्य परोक्ष रूप से मानव के लिए कल्याणकारी है। उन्होंने सांकृत्यायन के कहानी संग्रह ‘वोल्गा से गंगा’ का उल्लेख करते हुए जातियों के विकास की प्रमाणिक तस्वीर प्रस्तुत की। इसके साथ ही लोक भाषा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए जनमानस की भाषा में ही वार्तालाप करने के लिए प्रेरित किया। 
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए हिन्दी विभाग के समन्वयक डाॅ0 रिपु सूदन सिंह ने कहा कि भूमण्डलीकरण से उत्पन्न इस बाजारी सभ्यता के चकाचैंध में राहुल जी को याद करना विचारशून्यता, सौन्दर्य और असंवेदनशीलता के मरूस्थल में किसी शीतल जलखण्ड को पाने की तरह है। वैचारिकी की इस नकारात्मकता में जहाँ एक तरफ विचारधारा के अन्त का शंखनाद किया गया, इतिहासान्त की भी घोषणा कर दी गयी और लाभ और हानि की पूँजीवादी कलम से एक नये इतिहास संरचना की कामना की रूपरेखा तैयार की गयी, वहीं पर उम्मीदों से लवरेज, भाव से भरे, रोशनी, ज्ञान व इल्म की प्रबल इच्छा के साथ 20वीं सदी में 22वीं सदीं की परिकल्पना करने वाले, भागो नहीं दुनिया को बदलने की बात करने वाले राहुल के साहित्य की बरबस ही चर्चा करने की जरूरत महसूस हो रही है। मानव अधिकार विभाग की प्रवक्ता डा0 राशिदा अख्तर ने अपने सम्बोधन में बताया कि राहुल सांकृत्यायन पर जिनता शोध होना चाहिए था उनके विशद लेखन को देखते हुए वह आज तक नहीं हो पाया, राहुल जी से मेरा पहला साक्षात्कार अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा नामक निबंध के माध्यम से हुआ। उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्होंने आगे कहा कि वह ज्ञानार्जन के भंडार है। उनसे ज्ञान का अर्जन करके उसका परिमार्जन करना हितकर होगा। 
डा0 रियाज अहमद ने राहुल सांकृत्यायन के यात्रा वृतान्तों की तुलना  फारसी के विद्वान शेख सादी की पुस्तक ‘गुलिश्तां’ से करते हुए कहा कि 70 साल के जीवन काल में इतना सब कुछ लिख पाना कैसे सम्भव हुआ यह निश्चय ही शोध का विषय है। अपने जीवन काल में ज्यादातर समय वह यात्रा पर ही रहे।  यात्रा और लेखन का ऐसा अभूतपूर्व मिश्रण आज तक देखने को नहीं मिलता। डा0 अनीस अहमद ने इस अवसर पर अपने शेरो-शायरी से उपस्थित जनों को मंत्र मुग्ध कर दिया। शोध छात्र दीपेन्द्र नाथ पाठक ने कहा कि राहुल जी के लेखन को कुछ पृष्ठों में नहीं समेटा जा सकता। अपने पूरे जीवन काल में उनकी राहें बदलती रहीं, लेकिन लेखन निरन्तर चलायमान रहा। हिन्दी विभाग में अतिथि सहायक आचार्य सुश्री शिप्रा किरण ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन के साहित्य के मूल उत्स जनमानस तक पहंुचना है।  यह भाषा के माध्यम से सम्भव है, उनका साहित्य पूरे मानव सभ्यता के विकास की समझ के लिए प्रासंगिक है।  इस विकास की प्रक्रिया इतिहास को छोड़ा नहीं जा सकता है। प्राचीन एवं नवीन के मिश्रण से ही कुछ नया सृजित किया जा सकता है, जो मानव के लिए उपयोगी है। श्री राम कुमार गुप्ता निजी सचिव ने इस अवसर पर बताया कि विश्ववविद्यालय के हिन्दी विभाग में राहुल सांकृत्यायन जी का जन्म सप्ताह मनाया जाना आज (दि0 8-4-15 से 15-4-15 तक) से प्रारम्भ किया गया है। उन्होंने 150 से भी अधिक पुस्तकों की रचना की है। विषय प्रवर्तन और कार्यक्रम का संचालन करते हुए हिन्दी विभाग में अतिथि सहायक आचार्य डा0 धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि राहुल जी 24 भाषाओं के ज्ञाता और 150 से अधिक पुस्तकों के रचयिता थे। विभागीय पुस्तकालय में शीघ्र ही राहुल सांकृत्यायन की सभी पुस्तकें उपलब्ध करायी जायेंगी और छात्रों को उन पर शोध करने हेतु प्रेरित किया जायेगा। इनके अतिरिक्त डाॅ जोगेन्द्र कुमार, अंकुर सिंह, दीपक कुमार, इन्दुकुमारी, विनायक वन्दन पाठक आदि ने भी राहुल सांकृत्यायन के बारे में अपनी भावाभिव्यक्ति की।
इस अवसर पर हिन्दी विभाग के छात्र एवं छात्राओं क्रमशः अनिता, आयुषी, संगीता, संयोगिता, रितिका और संतोष  के द्वारा अभिनव प्रयोग करते हुए वोल्गा से गंगा बैंड के बैनर के तहत दहेज और कन्या भ्रूण हत्या से सम्बन्धित भावप्रदान और हदयविदारक भोजपुरी गीत शाीर्षक अरे माई जनिहे जे काखिया में धिया बिया तोरा त जन दिहे कोखिये में मार, मोरा मन ललसा बा इतने कि तोहरे सूरतिया के एक बेरी लिहती निहारी  प्रस्तुत किया । उक्त गीत से निकले श्रोताओं के आॅसुओ ने राहुत जी को सच्ची श्रद्धान्जलि व्यक्त किये। 







Monday, October 8, 2012

शारीरिक क्षमताओं का विस्तार है इलेक्ट्रानिक मीडिया


लखनऊ 07 अक्टूबर, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश की उत्कृष्ट केन्द्र योजना के अन्तर्गत आज दो दिवसीय इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला का समापन लखनऊ विश्वविद्यालय के ए0पी0 सेन सभागार में हुआ।
कार्यशाला के तृतीय तकनीकी सत्र में साहित्यकार एवं मीडिया विशेषज्ञ उषा सक्सेना ने कहा कि रेडियो शब्दों का माध्यम है जिससे अंधों का थियेटर कहा जाता है। यहां सुनना, देखना, रोना, हंसना सभी क्रियायें, वस्त्र, साज-सज्जा, मौसम शब्दों के द्वारा ही बताये जाते हैं। रेडियो नाटक लिखने के लिए अनिवार्य है कि सर्वप्रथम हम अपने लक्ष्य श्रोताओं के वर्ग विशेष को पहचाने। यह ध्यान रखने योग्य है कि रेडियो पर दृश्य सज्जा का कार्य संगीत और ध्वनि के माध्यम से किया जाता है। अतः दृश्यों को गतिशील बनाने के लिए संगीत का चुनाव आवश्यक है।
मीडिया विशेषज्ञ राकेश निगम ने विकास संचार के बारे में बताते हुए कहा कि आज विकास संचार ने मानव जाति को आधुनिक बना दिया है। मीडिया का सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव होना चाहिए। श्री निगम ने कहा कि कार्यक्रमों के निर्माण में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि कार्यक्रम मनोरंजन के साथ ही साथ शिक्षाप्रद भी प्रदान करे।
दूरदर्शन केन्द्र से आये आत्मप्रकाश मिश्र ने कहा कि कोई भी सामाजिक मुद्दा बिना सामुदायिक सहभागिता के पूरा नहीं किया जा सकता। समाज के निर्माण मंे व्यक्तिगत सहभागिता जरूरी है। लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के लिए शासन और जनता में आपसी संवाद जरूरी है जिसकी जिम्मेदारी दूरदर्शन और आकाशवाणी बखूबी निभा रही है। टी0वी0 के शुरूआती दिनों में सिर्फ 200 सेट थे लेकिन आज प्रत्येक घर में टी0वी0 सेट उपलब्ध हैं लेकिन मीडिया का स्वरूप बदल गया है। पहले जहां सामाजिक सरोकारों से संबंधित खबरों और कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाती थी वहीं आज बलत्कार, हत्या और डकैती जैसे कार्यक्रमों को मनोरंजक तरीके से पेश किया जा रहा है।
दूरदर्शन केन्द्र से आये श्री शिशिर सिंह ने कहा कि दृश्य एवं श्रव्य माध्यम के लेखन का मुख्य उद्देश्य सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन है। इसमें मनोरंजन स्वस्थ्य एवं समाज सापेक्ष होना चाहिए।
दिल्ली से पधारे श्री निमेष कुमार ने बताया कि वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में अपार संभावनायें हैं क्योंकि इसमें विषय विशेषज्ञों की कमी रहती है। अतः जो लोग विज्ञान के क्षेत्र से पत्रकारिता में आये हैं उन्हें विज्ञान पत्रकारिता को अपना आधार बनाना चाहिए जिसमें वह सफल होंगे। विज्ञान लेखन में सहज-स्वभाविक भाषा के अतिरिक्त तकनीकी शब्दावली को सामान्य जन के लिए सुलभ बनाना उनके लिए ही संभव है। हिन्दी में लिखकर ही विज्ञान का प्रचार प्रसार व्यापक रूप से किया जा सकता है। विज्ञान लेखन में सत्य तथ्यों का प्रयोग करें न कि अंधविश्वास पूर्ण कथ्यों का।
कार्यशाला के समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 बी0के0 कुठियाला ने इलेक्ट्रानिक मीडिया की बहुआयामी संभावनाओं पर विचार करते हुए बताया कि इलेक्ट्रानिक मीडिया मनुष्य प्रजाति को मनुष्य बनाने का उपक्रम करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रानिक मीडिया मनुष्य की शारीरिक क्षमताओं का विस्तार है जैसे-दृष्टि का कैमरा, आवाज का रेडियो, स्मृति का कम्प्यूटर। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का उद्देश्य सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की स्थापना होनी चाहिए। इसीलिये आज भौगोलिक एवं भौतिक दूरियां समाप्त करके विश्व ग्राम्य की कल्पना साकार हो रही है। वैज्ञानिकों का दिया हुआ वरदान-इलेक्ट्रानिक संसाधन हमारी मुठ्ठी में है जिसका सदुपयोग मनुष्य और मनुष्यता के विकास के लिए करना चाहिए।
दिल्ली से आये विज्ञापन विशेषज्ञ श्री सुभाष सूद ने इलेक्ट्रानिक मीडिया के विज्ञापनों पर चर्चा करते हुए कहा कि मीडिया पर प्रसारित विज्ञापन बाजार की दृष्टि से सफल हैं किन्तु सामाजिक दृष्टि से वे अपना दायित्व नहीं निभा पा रहे हैं। विज्ञापनों में प्रयुक्त भाषा, चित्र एवं कथानक सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों को विकृत कर रहे हैं। अतः विज्ञापन लिखते समय विशेषज्ञों को वर्ग, बजट, उत्पाद की गुणवत्ता, उत्पादक की लाभ-हानि पर विचार करने के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे विज्ञापन अपना प्रभाव छोड़ सके। इंटरनेट के आने से सोशल मीडिया नेटवर्क विज्ञापन के लिए नया क्षेत्र प्रस्तुत करता है। सेल्यूलर फोनों ने भी विज्ञापन का नया बाजार उपस्थित किया है।
दिल्ली से आये श्री मुकेश कुमार ने प्रतिभागियों से कहा कि जो कुछ सीखा जाए उसे व्यवहारिक रूप में लाना अति आवश्यक है।
कार्यशाला के समापन पर ए0बी0पी0 न्यूज के स्थानीय सम्पादक पंकज झा ने कहा कि मीडिया में जगह बनाने के लिए भाषा का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। हमें शुद्ध उच्चारण पर विशेष ध्यान देना होगा।
इंडिया न्यूज के ब्यूरो प्रमुख श्रेय शुक्ल ने मीडिया के लिए समय की पाबंदी को आवश्यक बताते हुए कहा कि कार्य करते समय वक्त की नजाकत और समय सीमा ही कार्यक्रम को सफल बनाती है। श्री शुक्ल ने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने से समाचारों को प्रस्तुत करने में आसानी हुई है और एक ही व्यक्ति अब कई कार्यों को एक साथ कर लेता है।
कार्यशाला में अतिथियों का स्वागत हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो0 के0डी0 सिंह ने तथा संचालन डाॅ0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी और धन्यवाद ज्ञापन प्रो0 पवन अग्रवाल द्वारा किया गया। दो दिवसीय कार्यशाला की रिपोर्ट डाॅ0 मनोज कुमार द्वारा प्रस्तुत की गई।
दो दिवसीय कार्यशाला में महाराणा इंस्टीट्यूट आॅफ कम्यूनिकेशन स्टडीज से डाॅ0 इन्द्रेश मिश्र, फिल्म इंस्टीट्यूट आॅफ इमिट्स से डाॅ0 पंकज शुक्ल, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग कानपुर विश्वविद्यालय से डाॅ0 रश्मि गौतम, ए0आर0सी0जे0एम0सी0 से विकास सिंह, श्री नारायन इंस्टीट्यूट, जहांगीराबाद मीडिया संस्थान, बाराबंकी, एमिटी विश्वविद्यालय, बी0एस0एन0वी0 पी0जी0 कालेज तथा अन्य कालेजों व विश्वविद्यालयों से प्रशिक्षुओं ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।

समाचार के प्रस्तुतीकरण में संयमित भाषा जरूरी



लखनऊ 06 अक्टूबर, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश की उत्कृष्ट केन्द्र योजना के अन्तर्गत आज दो दिवसीय इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रशिक्षण कार्यशाला का उद्घाटन लखनऊ विश्वविद्यालय के ए0पी0 सेन सभागार में हुआ।
कार्यशाला के अध्यक्ष माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रो0 रामजी त्रिपाठी ने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया एक विशेष धारा है जिसमें अनन्त संभावनाएं हैं। इसमें कार्य करने के लिए जुनून की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि आज इलेक्ट्रानिक चैनलों पर जो कार्यक्रम दिखाये जाते हैं उन कार्यक्रमों को परिवार के साथ बैठकर नहीं देखा जा सकता है यह दुखद है। इसमें किसी प्रकार की आचार संहिता नहीं है जिससे इन पर अंकुश लगाना मुश्किल है लेकिन अपनी सोच से फूहड़ कार्यक्रमों को रोका जा सकता है। आज बड़े व्यावसायी या राजनेता चैनल तो स्थापित कर ले रहे हैं परन्तु वह चैनल को चलाने हेतु अपनी संस्कृति को छोड़कर नकारात्मक कार्यक्रमों को प्रसारित कर रहे हैं ताकि उनका चैनल प्रतिस्पर्धा में आगे हो। प्रो0 त्रिपाठी ने कहा कि आज सकारात्मक समाचारों की बाढ़ सी है लेकिन समाचार चैनलों द्वारा हत्या, डकैती, अपहरण तथा बलात्कार आदि खबरों को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है। उन्होंने कहा कि आज अच्छे मीडिया विशेषज्ञों की आवश्यकता है जो समाचार चैनलों को सही दिशा दे सके।
दिल्ली से आये मीडिया विशेषज्ञ श्री मुकेश कुमार ने कहा कि मीडिया जगत में कार्य करने वाले 90 प्रतिशत मीडिया कर्मी भाषा में पारंगत नहीं हैं। श्री कुमार ने कहा कि यह दुखद है कि हम जन्म लेते ही जिस भाषा में बोलना शुरू करते हैं उसी भाषा पर सही लिखने और पढ़ने का अधिकार नहीं रख पाते हैं। उच्चारणों पर ध्यान देना होगा तभी शब्दों का सही अर्थ स्पष्ट हो सकेगा। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के चैनल अब सस्ते में कार्य करने वाले लोगों को मौका दे रही है जिससे समाचारों की गुणवत्ता में निरन्तर गिरावट आ रही है। उन्होंने कहा कि आप भावी पत्रकार हैं आपको बहुत बड़े संवर्ग को सम्बोधित करना है। अतः आप समाज के समक्ष सही तथ्यों को लाना होगा।
विशिष्ट अतिथि दूरदर्शन केन्द्र लखनऊ के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक डाॅ0 सतीश ग्रोवर ने बताया कि मीडिया के क्षेत्र में कार्य करने के लिए पहले अपने आप को पहचानकर उन गुणों को विकसित करने की आवश्यकता होगी। अपने आपको भीड़ से अलग कर कार्य करने की आवश्यकता है ताकि इसमें एक पहचान मिल सके। यह एक विशिष्ट क्षेत्र है जिसमें पैसे से ज्यादा कार्य का महत्व है इसलिए इसमें विशिष्ट लोगों के आने की आवश्यकता है। मीडिया के  क्षेत्र में कार्य करने हेतु अभ्यास की जरूरत है इसलिए प्रतिदिन सीखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया के आने से समाचार तो जरूर मिल रहा है लेकिन यह समुचित ज्ञान नहीं दे पा रहा है जिससे समाचरों के प्रस्तुतिकरण में व्यापक बदलाव आया है। समाचारों को लिखने मंे संयमित भाषा का प्रयोग करना होगा।
हिन्दी तथा पत्रकारिता विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित ने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का लेखन इतना प्रभावशाली होना चाहिए जिससे दर्शकों/श्रोताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सके। उन्होंने कहा कि समाचारों में सांस्कृतिक चेतना और आर्थिक पक्षों को इस तरह उजगार करना चाहिए जिससे समाज लाभान्वित हो सके। समाचारों को प्रस्तुत करते समय स्थानीय भाषा का प्रयोग करना चाहिए इससे दर्शकों व श्रोताओं में आत्मीयता का बोध हो सके। उन्होंने कहा कि एक अच्छे पत्रकार में मीडिया की समस्त विधाओं का समावेश होना चाहिए। उसके अंदर प्रस्तुतिकरण की भी क्षमता होनी चाहिए ताकि वह समाचारों में गंभीरता ला सके। उन्होंने कहा कि मीडिया में चयन उन्हीं लोगों का होता है जिसके अंदर कार्य करने की क्षमता होती है। प्रो0 दीक्षित ने कहा कि गलतियों से सीखने की आवश्यकता है घबड़ाने की नहीं।
अतिथियों का स्वागत करते हुए हिन्दी विभाग की अध्यक्ष प्रो0 कैलाश देवी सिंह ने कहा कि आज इलेक्ट्रानिक मीडिया का युग है जिसने पूरे विश्व को एक गांव का रूप दे दिया है। इसका असर हमारे जीवन में नकारात्मक या सकारात्मक दोनों ही रूपों में दिखाई पड़ रहा है। जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। इलेक्ट्रानिक मीडिया का जादू बच्चों, बूढ़ों और नौजवानों पर सिर चढ़कर बोल रहा है। आज टी0वी0, कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि हमारे जीवन के अंग बन गये हैं। कुल मिलाकर संचार माध्यमों ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है।
कार्यशाला का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। संचालन डाॅ0 श्रुति और धन्यवाद ज्ञापन डाॅ0 रमेशचन्द्र त्रिपाठी द्वारा किया गया।