Friday, August 31, 2012

हिन्दी में विज्ञान लेखन कार्यशाला कल से


अगस्त, 2012,! लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन की उत्कृष्ट योजना के अन्तर्गत दिनांक 1 और 2 सितम्बर, 2012 को दो दिवसीय ‘हिन्दी में विज्ञान लेखन’ कार्यशाला का आयोजन विश्वविद्यालय के ए0पी0 सेन सभागार में किया जा रहा है।
हिन्दी भाषा के माध्यम से विज्ञान लेखन की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग ने ‘हिन्दी में विज्ञान लेखन’ कार्यशाला का आयोजन किया है। विज्ञान जीवन के हर क्षेत्र में प्रसांगिक हो गया हैं इसलिए विज्ञान की सम्यक समझ हेतु क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से विज्ञान का प्रचार-प्रसार अति आवश्यक होता जा रहा है। संस्कृति और भाषा का गहरा सम्बन्ध होता है। इसी सम्बन्ध के नाते वैज्ञानिकों की मूल सोच, परिकल्पना उनकी अपनी मात्र भाषा में ही उद्भासित होती है। तकनीकी विकास में भाषाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। विज्ञान लेखक और संचारक दोनो का दायित्व है कि विज्ञान को सरल ढ़ग से आम जनता तक ले जाएँ। विश्व में ज्ञान के व्यापीकरण हेतु विज्ञान का प्रचार-प्रसार क्षेत्रीय भाषाओं में अनिवार्य हो गया है।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य है कि प्रत्येक प्रशिक्षु को हिन्दी भाषा के माध्यम से विज्ञान लेखन का प्रशिक्षण व्यावहारिक रूप में दिया जाए। इस कार्यशाला में विज्ञान परिषद इलाहाबाद के वैज्ञानिक डा0 दिनेश मणि, के अतिरिक्त डा जे0के0 जौहरी और आनंद कुमार अखिला, प्रो0 महेन्द्र सिंह सोढ़ा, प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित, डा0 महेन्द्रप्रताप सिंह, डा0 प्रदीप श्रीवास्तव, प्रो0 कृष्ण गोपाल दुबे, डा0 सी0एम0 नौटियाल, प्रो0 ए0के0 शमार्, डा0 जाकिर अली रजनीश, डा0 ध्रुवसेन सिंह, प्रो0 नदीम हसनैन और प्रोफेसर भूमित्र देव जैसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिकां द्वारा प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। कार्यषाला में प्रषिक्षण के विषय हैं- हिन्दी में विज्ञान लेखन का विकास, जैविक नियंत्रण और पर्यावरण हितैषी विधि, स्वास्थ्य और प्रसन्नता, हिन्दी में विज्ञान का स्वरूप, हिन्दी में पर्यावरण बदलाव और ग्लोबल वार्मिंग, हिन्दी मंे वैज्ञानिक शोध लेखन तकनीक, मीडिया मंें लेखन प्रविधि, हिन्दी की वैज्ञानिक शब्दावली, सर्जनात्मक साहित्य में विज्ञान लेखन, जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक या मानव जनिक, हिन्दी में मानव विज्ञान लेखन की समस्याएँ और हिन्दी में विज्ञान लेखन की समस्याएं और संभावनाएं  आदि।
कार्यशाला के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता कगे- लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 मनोज कुमार मिश्र और कार्यषाला के मुख्य अतिथि हांेगे- देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय इंदौर, लखनऊ विश्वविद्यालय और बरखतउल्ला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति-प्रो0 महेन्द्र सिंह सोढ़ा।

Wednesday, August 29, 2012

हिन्दी विभाग में पी-एच0डी0 की मौखिकी सम्पन्न

दिनांक 29 अगस्त 2012। आज हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में श्री सौरभ पाल की पी-एच0डी0 मौखिकी की परीक्षा सम्पन्न हो गयी। अत्यंत कर्मठ, प्रतिभाशाली और होनहार छात्र श्री पाल ने डा0 रीता चैधरी के निर्देशन में ‘इलाचन्द जोशी के उपन्यासों में पाश्चात्य विचारधाराएँ: एक अध्ययन’ विषय पर अपना शोधकार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किया। इसके पूर्व पाल जी ने विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से ही वर्ष 2008 में एम0फिल्0 की उपाधि प्राप्त की और ‘शम्भूनाथ की साहित्य साधना’ पर अपना लघु शोध प्रबंध पूर्ण किया था। आपके अभी तक दर्जन भर से अधिक शोध पत्र विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

Sunday, August 19, 2012

तुलनात्मक साहित्य औपनिवेशिक राजनीति का शिकार हुआ

लखनऊ: 19 अगस्त, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन की ‘उत्कृष्ट केन्द्र योजना’ के अन्तर्गत आयोजित दो दिवसीय शोध प्रविधि कार्यशाला के दूसरे दिन शोधार्थियों को पाठानुसंधान प्रक्रिया के अन्तर्गत वक्तव्य देते हुए पंजाब विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 जयप्रकाश ने कहा कि पाठानुसंधान पाठकों की भाषा वैज्ञानिक पद्धति से ही पाठ विचार कराती है। पाठ को सृजनात्मक रूप से पढ़ते हैं। पाठानुसंधान में रचनाकाल की बहुत आवश्यकता है इससे कविता का विषयवस्तु मिल जाती है। पाठ, भाषा और रूप दो बातों से मिलकर बना है।
    उन्होंने कहा कि समकालीन साहित्य पर शोधपरक यात्रा समाप्त हो रही है। जो व्यक्ति जीवित होता था उसके निधन के 50 वर्ष बाद ही उसकी रचना पर शोध कार्य होता था अब वह स्थिति विलुप्त हो रही है। अब नये से नये साहित्यकारों के साहित्य और रचना पर शोध कार्य कराये जा रहे हैं। ये आजीविका प्रदायी तो है लेकिन यह अध्यापकों और शोध छात्रों के लिए बेहतर भविष्य नहीं हो सकते। पूर्व में शोध प्राचीन ग्रन्थों पर होता था जो उपाधि के लिए नहीं निरूपाधि के लिए होता था। पहले का शोध पुराने ग्रन्थों के उद्धार के लिए ज्यादा हुआ करता था परन्तु आज स्थिति इसके विपरीत है। आज अगर शोध कार्य कराने हेतु पुराने ढंगों को अपनाया जाए तो शोध हेतु विषयों की कमी नहीं आयेगी।
    आज देश में हिन्दी की अनेकों पाण्डुलिपियां हैं जो जगह-जगह पाठकों की प्रतीक्षा कर रही हैं। पाठक उन तक पहुंचे और उन विषयों पर काम करें। उन्होंने कहा कि काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में बिहारी सतसई में 713 दोहे हैं कहीं 716 दोहे हैं। बिहारी सतसई पर ठाकुर कवि ने एक टीका लिखा है- सतसईया वर्णनाथ टीका। उन्होंने कहा कि बिहारी सतसई की रचना उनकी पत्नी राधा ने लिखी थी, इसमें 1400 दोहे लिखे हैं, इसकी पाण्डुलिपि काशी नरेश के पुस्तकालय में ताले में बंद है।     700 दोहे शोधार्थियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। स्वर्ण मंदिर के पुस्तकालय मंे सैकड़ों हिन्दी की पाण्डुलिपियां सुरक्षित हैं जो गुरूमुखी लिपि मंे ब्रज भाषा में हैं। ये सैकड़ों वर्षों से वहां पड़ी हैं जिन पर शोध कार्य नहीं हुए हैं। ऐसे तमाम विषय हैं जिन पर शोध कार्य किया जाना आवश्यक है परन्तु खेद का विषय है कि आज शोध निर्देशक व शोधार्थी आवृत्ति और पुनरावृत्ति से काम चला रहे हैं। प्रो0 जय प्रकाश ने पाण्डुलिपियों की प्राचीनता का आकलन करने के लिए, नई प्रयोगशालाओं का उपयोग करने पर जोर दिया। डेटिंग आदि कराकर, कृति के काल निर्धारण किया जा सकता है।
    राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के हिन्दी विभाग से आये प्रो0 हनुमानप्रसाद शुक्ल ने तुलनात्मक शोध प्रक्रिया पर अपनी बात रखते हुए कहा कि तुलनात्मक शोध प्रक्रिया इधर एक दो वर्षों से अनुशासन का स्वरूप ग्रहण कर लिया है। 1816-1854 के तुलनात्मक साहित्य की बात चर्चा में आई। इसे विवादों के तौर पर स्वीकार किया गया। आज तुलनात्मक साहित्य यूरोप से हटकर अमेरिका में केन्द्रित हो गया। यह बनी बनाई अवधारणा को सामने लाती है। इसके विकास क्रम पर दृष्टि डालें तो तुलनात्मक साहित्य औपनिवेशिक राजनीति का शिकार होता रहा है। यूरोपियन औपनिवेशवाद से उपजा तुलनात्मक साहित्य, आज अमेरिकी साम्राज्यवाद से ज्यादा प्रभावित है। उन्होंने कहा कि विज्ञान में बायोलाॅजी से माइक्रोबायोलाॅजी व बायोटेक्नोलाॅजी बना तो उसे समाज ने स्वीकार किया फिर हिन्दी से अगर कोई विषय बनता है तो उसे समाज क्यों नहीं स्वीकारता ? तुलनात्मक साहित्य, साहित्य की अध्ययन प्रविधि ही नहीं अपितु साहित्य को पढ़ने की सम्पूर्ण विधि है। इसके केन्द्र में मनुष्य है जो समाजोपयोगी है। वर्तमान समय में तुलनात्मक साहित्य एक अनुशासन के रूप में विकसित हुआ है। उन्होंने अनुवाद पर जोर देते हुए कहा कि बिना अनुवाद के तुलनात्मक साहित्य को पढ़ना बेमानी है। अनुवाद को तुलनात्मक साहित्य का औजार बनाईये। यह जरूरी नहीं कि बड़ा नाम ही अनुवाद करे तो ही बड़ा माना जायेगा। अगर सृजनात्मक अनुवाद किया जाये जिसमें मौलिकता हो, विचार हो तो भी अनुवाद बड़ा माना जायेगा। बिना अनुवाद के तुलनात्मक साहित्य को समझा और परखा नहीं जा सकता। तुलनात्मक साहित्य मूलतः अनुवाद अध्ययन है। इसमें अभी काम करने की सौ प्रतिशत गंुजाइश है। तुलनात्मक साहित्य में लेख तो लिखे गये हैं लेकिन पूर्ण सामग्री आज तक नहीं लिखी गयी यहां तक की अंग्रेजी में भी। उन्होंने कहा कि भारत के जितने भी भाषाविद हैं किसी ने भी तुलनात्मक साहित्य का सैद्धांतिक पक्ष नहीं लिखा है। इसमें प्रभाव की महत्वपूर्ण भूमिका है यह दो तरफा प्रक्रिया है। अगर साहित्य से संस्कृत को अलग कर दिया जाये तो साहित्य को कभी भी नहीं पढ़ा जा सकता है। किसान जीवन का अध्ययन हिन्दी में देखने को नहीं मिलता जो दुखद है।
    कार्यशाला के अंतिम सत्र में प्रतिभागी प्रशिक्षुओं को प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया गया जिसके अंतर्गत संदर्भ ग्रंथ सूची, बिबिलियोग्राफी, परिशिष्ट तथा विषय सूची आदि बनाने से संबंधित प्रायोगिक कार्य कराया गया।
    कार्यशाला के समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए पंजाब विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 जयप्रकाश ने कहा कि ब्रजभाषा ने हिन्दी को अन्तर प्रान्तीय चरित्र दिया है। हिन्दी कभी राष्ट्र भाषा नहीं होती अगर पूर्व में कवितायें ब्रजभाषा में नहीं लिखी गई होतीं। कश्मीर में ब्रज भाषा के बहुत से साहित्य थे। हिमाचल प्रदेश और पंजाब में जो रियासतें थीं उनमें ब्रज भाषा के कवि बैठते थे। कच्छ की ब्रजभाषा पाठशाला का आज भी निजी महत्व है। आज वही ब्रज भाषा से पूरित हिन्दी विश्व में अपना परचम फहरा रही है।
    समापन समारोह पर हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित ने कहा कि भाषा, साहित्य और संस्कृति का रेखीयकरण अध्ययन नहीं होता। इसका अध्ययन करने के लिए अधिक से अधिक प्रश्नावली और साक्षात्कार प्रविधियों का प्रयोग किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अपने मनोभावों को समझकर ही शोध के विषय का चयन करना चाहिए। साहित्य को अगर अच्छी तरह समझना हो तो किसी एक साहित्य को पढ़ना होगा ताकि उसकी प्रकृति और समुदाय को अच्छी तरह समझ जा सके। उन्होंने कहा कि शोध प्रबंध की भाषा तत्समबहुला होती है। उसमें मानक हिन्दी का प्रयोग करना वांछनीय है। शोध की भाषा भावोद्रेक नहीं होनी चाहिए। प्रो0 दीक्षित ने जोर देकर कहा कि यू0जी0सी0 के मानदण्डों के अनुरूप ही शोधार्थियों को शोध कराया जाए ताकि उन्हें भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। मनुष्य के विकास का मुख्य स्रोत शोध है।
    कार्यक्रम का संचालन डा0 श्रुति व डा0 हेमांशु सेन ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो0 पवन अग्रवाल द्वारा किया गया। कार्यशाला में प्रो0 के0डी0 सिंह, डा0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी, डा0 अलका पाण्डेय, डा0 परशुराम पाल, रविकान्त, डा0 ममता तिवारी, डा0 कृष्णा जी श्रीवास्तव, डा0 टी0पी0 राही व अन्य विभागीय शिक्षकगण, शोधार्थी व कर्मचारी मौजूद थे।

Saturday, August 18, 2012

शोध कार्य को पूर्ण करने के लिए प्रासंगिकता और प्रमाणिकता जरूरी

लखनऊ: 18 अगस्त, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा ने उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन की ‘‘उत्कृष्ट केन्द्र योजना’’ के अंतर्गत दो दिवसीय शोध प्रविधि कार्यशाला का आयोजन ए0पी0 सेन सभागार मंे हुआ।
    कार्यशाला का शुभारम्भ प्रो0 रश्मि पाण्डेय, प्रो0 एस0पी0 दीक्षित, प्रो0 जय प्रकाश, प्रो0 के0डी0 सिंह ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। जबकि कार्यक्रम का संचालन डाॅ0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी द्वारा किया गया।
    कार्यशाला की मुख्य अतिथि कला संकाय की संकायाध्यक्ष प्रो0 रश्मि पाण्डेय ने कहा कि शोध प्रविधि अध्ययन का मूल है यह एक लम्बी प्रक्रिया है। आज शोध को लेकर शोधार्थी गंभीर नहीं हैं। शोधार्थी रियल शोध पर कम ध्यान दे रहे हैं जबकि पी0एच0डी0 मंे प्रवेश के समय से ही शोध प्रविधि का प्रयोग शुरू हो  जाता है। शोधार्थियों को विषय का चयन करते समय बहुत ही सचेत रहना चाहिए क्योंकि विषय बहुत बड़ा सागर है और सागर में विष और अमृत दोनों होता है जबकि एक शोधार्थी को सिर्फ अमृत की तलाश रहती है जो समाज के लिए उपयोगी है। उन्होंने शोध कार्य पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शोधार्थी उत्साह में विषय तो बहुत उच्च कोटि का चुन लेते हैं परन्तु उसे बीच में ही छोड़ देते हैं जबकि उन्हें शोध सामग्री देखकर विषय का चयन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चाहे शोध कार्य हो या कविता का निर्माण हो प्रमाणिकता जरूरी है। शोध कार्य को पूर्ण करने के लिए प्रासंगिकता और प्रमाणिकता जरूरी है इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
    पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 जयप्रकाश ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि विषयो में प्रवर्तन होना साधु संतों के लिए अच्छा नहीं होता लेकिन साहित्यिक जीवन में विषय प्रवर्तन होना बहुत आवश्यक है। रूप, रस, छंद को मिलाकर साहित्य बनता है। साहित्य निर्माण में अगर असंतोष व्याप्त होता है तो वह स्वयं ही साहित्य की रचना कर लेता है। रचनाकारों को रचनाकार बनाने में असंतोष का बहुत बड़ा हाथ है अगर उनमें असंतोष न हो तो वे अच्छे रचनाकार नहीं हो सकते हैं। साहित्य को पढ़ने-पढ़ाने की दो दृष्टि है-समझना और ज्ञान प्राप्त करना। ज्ञान अज्ञात साहित्य को समझने से मिलता है जिसे शोध कहते हैं। जो रचना नहीं है उसे समीक्षा कहते हैं। शोध में समीक्षा शोधोन्मुख से आता है। समीक्षा को शोध नहीं कहा जा सकता है। शोध मंे समीक्षा सदैव द्वितीय होता है अगर यह प्रथम हो जाये तो शोध खंडित हो जाता है। हिन्दी के शोध में स्थिति समीक्षा प्रधान हो गयी है जिससे शोध द्वितीयक हो गया है। अनुसंधान करते समय अनुशासन की आवश्यकता है। अनुशासन का नाम ही शोध प्रविधि है। एक के बाद एक सोपान चढ़कर निष्कर्ष लाना ही शोध प्रविधि है। इसके विपरीत आलोचना में अनुशासन नहीं होता। अनुशासन को साहित्य नहीं मानता, साहित्य का रचनाकार नियमों को नहीं मानता जबकि साहित्यिक अनुसंधान में नियंत्रण ही शोध प्रविधि है। अगर नियंत्रण नहीं होगा तो अराजकता फैलेगी जो समीक्षा कहलाती है और समीक्षा सही निष्कर्ष नहीं देता। समीक्षा मंे नियंत्रण नहीं होता है सिर्फ अराजकता होती है। उपन्यास सम्राटों, काव्य सम्राटों, साहित्यिक आलोचक व समीक्षक में अराजकता होती है उनमें नियंत्रण प्रविधि नहीं होती। शोध प्रविधि को ईमानदारी से समझने और उसके पालन की आवश्यकता है। शोध प्रविधि से पूर्व शोध आलेखों को लिखने और समझने की जरूरत है।
    लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि यह वर्ष हिन्दी शोध का शताब्दी वर्ष है। 1913 में हिन्दी शोध की शुरूआत हुई थी जो इस साल 100 वर्ष पूर्ण कर लिया है। भारत मंे शोध कार्य लगभग 80 वर्ष पूर्ण कर लिया है। भारत की पहली शोध उपाधि डाॅ0 पीताम्बर भारद्वाज को प्राप्त हुई जो इसी विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य किये। लखनऊ विश्वविद्यालय में 1948 से शोध कार्य प्रारम्भ हुआ और अब तक लगभग 1000 थिसिस विश्वविद्यालय ने हिन्दी जगत को दे चुका है। उन्होंने कहा कि शोध कार्य का सीधा लाभ समाज का नहीं मिल रहा जो सोचनीय है। आज शोध कार्य बंधी बंधाई परिपाटी पर चला रहा है। विषय की रूप रेखा का चयन एक तकनीकी है और तकनीकी के अन्तर्गत कार्य करने पर ही शोध कार्य अच्छा परिणाम देता है। शोध के पाठ्यक्रम को स्नातक और परास्नातक स्तर पर शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शोध मौलिक और उपयोगी होना चाहिए और उन्हीं विषयों पर कार्य करना चाहिए जिस पर शोध सामग्री उपलब्ध हो। प्रो0 दीक्षित ने कहा कि पुनरावृत्ति में मौलिकता नहीं होती जिससे विषय का चयन बहुत ही सावधानी से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शोध के विषय को आवंटित करते समय निर्देशक सजग नहीं रहते जिससे लगभग 90 प्रतिशत शोध कहानी और उपन्यास पर ही हो रहा है। कविता में शोधार्थी रूचि नहीं ले रहे हैं जो अत्यन्त जरूरी है। आज आदान-प्रदान भाव से शोध हो रहा है जो शोध के विषय आवंटन में अराजकता है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज ज्यादातर शोध बाजार से लिखवाये जा रहे हैं ये बहुत ही गलत है और अच्छे शोध निष्कर्ष सामने नहीं आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि आवश्यकता है कि ग्राहकों की मांग के अनुसार इन विषयों पर प्रायोजित शोध कार्य कराये जायें। विदेशों में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रों में प्रायोजित शोध कार्य को ही वरीयता दी जाती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने उत्पाद की बेहतर खपत हेतु विश्वविद्यालयों को यथेष्ट वित्तीय साधन जुटाकर ‘मार्केट रिसर्च’ करवाती है।
    प्रो0 ए0एन0 सिंह, पूर्व अध्यक्ष, समाज कार्य विभाग ने कहा कि नवीनतम आयामों के आधार पर शोध प्रारम्भ करते हैं तो पूरा चक्र कम समय में कम धन व्यय ही पर शोध अच्छा हो जाता है। शोध समाज के लिए उपयोगी है इस बात का ध्यान देना चाहिए। किसी भी शोध के लिए परिकल्पना जरूरी है तभी किसी शोध का परीक्षण क्रमवार निष्कर्ष पर पहंुचेगा।
    शिक्षाशास्त्र विभाग के प्रो0 अनिल शुक्ल ने कहा कि शोध मनोवेगों से निकलता है। अलग-अलग लोग शब्दों के कई अर्थ निकालते हैं। किसी भी शोध के लिए अन्तर्वस्तु विश्लेषण जरूरी है लेकिन व्याख्या अलग होती है। धुंए मंे आग दिखाना साहित्य की प्रवृत्ति है। साहित्य शोध में आंख और कान दोनों काम करता है। कला मंे सच लम्बे समय तक रहता है। सत्य के अनंत पक्ष हैं यही आधुनिक शोध है।
    कार्यशाला के अंतिम सत्र में प्रतिभागी प्रशिक्षुओं को  विषयानुसार 5 समूहों मंे विभाजित किया गया। समूहों के विषय थे- विचारधारा, समाजिक मनोवैज्ञानिक, पाठानुसंधान, प्राचीन साहित्य, लोक साहित्य और पत्रकारिता थे। इस प्रायोगिक प्रशिक्षण द्वारा प्रशिक्षुओं को विषयानुक्रमणिका, संदर्भ ग्रंथ सूची, अध्याय विभाजन आदि से संबंधित प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया गया।
    कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो0 के0डी0 सिंह ने अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ एवं स्मृति चिन्ह प्रदान कर किया। कार्यक्रम की शुरूआत सरस्वती वंदना से हुई।

Friday, August 17, 2012

दो दिवसीय शोध प्रविधि कार्यशाला

17 अगस्त, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश शासन की उत्कृष्ट केन्द्र योजना के अन्तर्गत दिनांक दिनांक 18 व 19 अगस्त, 2012 को दो दिवसीय शोध प्रविधि कार्यशाला का आयोजन विश्वविद्यालय के ए0पी0 सेन सभागार में किया जा रहा है।
 उत्कृष्ट शोध की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग ने शोध प्रविधि कार्यशाला का आयोजन किया है। शोध की प्रवृत्ति वस्तुतः एक सहज प्रवृत्ति है। ज्ञान की उपासना जब से चली तब से उसके साथ ही शोध की प्रवृत्ति भी चली। शोध उच्च शिक्षा का एक महत्वपूर्ण तत्व है। विश्वविद्यालय जो ज्ञान के अधिवास माने जाते हैं उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वहां से प्रमाणिक और ऐसे उच्च गुणवत्ता वााले शोध लोग करते रहेेंगे जिसका समाज पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़े। पठन-पाठन और शोध का संबंध इस तरह से जुड़ा होना चाहिए कि वह विश्वविद्यालय के शैक्षणिक कार्यक्रम में प्रासंगिक भी हों।
 कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य है कि प्रत्येक प्रशिक्षु शोध प्रविधि की प्रारंभिक प्रक्रिया साहित्य में सर्वे के लिए इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों के उपयोग को समझ सके। शोध-कार्य पूर्ण करने के लिए सही शोध-प्रविधि का चयन व डाटा एकत्रित करने के लिए सही समुचित उपकरण का प्रयोग कर सके। वर्तमान समय में शोध-प्रविधि के नवीन स्वरूप, साफ्टवेयर प्रयोग, शोध प्रारूप, शोध कार्य से लाभ तथा शोध प्रविधि पर ब्लाग के विकास की जानकारी दी जायेगी।
 कार्यशाला के प्रथम सत्र में शोध का स्वरूप और विकास, अंतर्वस्तु विश्लेषण और हिन्दी साहित्य तथा शोध की नूतन प्रविधियां बताई जायेंगी व द्वितीय सत्र में प्रशिक्षुओं को प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया जायेगा।
 कार्यशाला की मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कला संकाय की संकायाध्यक्ष प्रो0 रश्मि पाण्डेय हैं जबकि कार्यशाला की अध्यक्षता पत्रकारिता एवं हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 सूर्य प्रसाद दीक्षित करेंगे।