Saturday, August 18, 2012

शोध कार्य को पूर्ण करने के लिए प्रासंगिकता और प्रमाणिकता जरूरी

लखनऊ: 18 अगस्त, 2012। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा ने उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन की ‘‘उत्कृष्ट केन्द्र योजना’’ के अंतर्गत दो दिवसीय शोध प्रविधि कार्यशाला का आयोजन ए0पी0 सेन सभागार मंे हुआ।
    कार्यशाला का शुभारम्भ प्रो0 रश्मि पाण्डेय, प्रो0 एस0पी0 दीक्षित, प्रो0 जय प्रकाश, प्रो0 के0डी0 सिंह ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। जबकि कार्यक्रम का संचालन डाॅ0 रमेश चन्द्र त्रिपाठी द्वारा किया गया।
    कार्यशाला की मुख्य अतिथि कला संकाय की संकायाध्यक्ष प्रो0 रश्मि पाण्डेय ने कहा कि शोध प्रविधि अध्ययन का मूल है यह एक लम्बी प्रक्रिया है। आज शोध को लेकर शोधार्थी गंभीर नहीं हैं। शोधार्थी रियल शोध पर कम ध्यान दे रहे हैं जबकि पी0एच0डी0 मंे प्रवेश के समय से ही शोध प्रविधि का प्रयोग शुरू हो  जाता है। शोधार्थियों को विषय का चयन करते समय बहुत ही सचेत रहना चाहिए क्योंकि विषय बहुत बड़ा सागर है और सागर में विष और अमृत दोनों होता है जबकि एक शोधार्थी को सिर्फ अमृत की तलाश रहती है जो समाज के लिए उपयोगी है। उन्होंने शोध कार्य पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शोधार्थी उत्साह में विषय तो बहुत उच्च कोटि का चुन लेते हैं परन्तु उसे बीच में ही छोड़ देते हैं जबकि उन्हें शोध सामग्री देखकर विषय का चयन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चाहे शोध कार्य हो या कविता का निर्माण हो प्रमाणिकता जरूरी है। शोध कार्य को पूर्ण करने के लिए प्रासंगिकता और प्रमाणिकता जरूरी है इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
    पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 जयप्रकाश ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि विषयो में प्रवर्तन होना साधु संतों के लिए अच्छा नहीं होता लेकिन साहित्यिक जीवन में विषय प्रवर्तन होना बहुत आवश्यक है। रूप, रस, छंद को मिलाकर साहित्य बनता है। साहित्य निर्माण में अगर असंतोष व्याप्त होता है तो वह स्वयं ही साहित्य की रचना कर लेता है। रचनाकारों को रचनाकार बनाने में असंतोष का बहुत बड़ा हाथ है अगर उनमें असंतोष न हो तो वे अच्छे रचनाकार नहीं हो सकते हैं। साहित्य को पढ़ने-पढ़ाने की दो दृष्टि है-समझना और ज्ञान प्राप्त करना। ज्ञान अज्ञात साहित्य को समझने से मिलता है जिसे शोध कहते हैं। जो रचना नहीं है उसे समीक्षा कहते हैं। शोध में समीक्षा शोधोन्मुख से आता है। समीक्षा को शोध नहीं कहा जा सकता है। शोध मंे समीक्षा सदैव द्वितीय होता है अगर यह प्रथम हो जाये तो शोध खंडित हो जाता है। हिन्दी के शोध में स्थिति समीक्षा प्रधान हो गयी है जिससे शोध द्वितीयक हो गया है। अनुसंधान करते समय अनुशासन की आवश्यकता है। अनुशासन का नाम ही शोध प्रविधि है। एक के बाद एक सोपान चढ़कर निष्कर्ष लाना ही शोध प्रविधि है। इसके विपरीत आलोचना में अनुशासन नहीं होता। अनुशासन को साहित्य नहीं मानता, साहित्य का रचनाकार नियमों को नहीं मानता जबकि साहित्यिक अनुसंधान में नियंत्रण ही शोध प्रविधि है। अगर नियंत्रण नहीं होगा तो अराजकता फैलेगी जो समीक्षा कहलाती है और समीक्षा सही निष्कर्ष नहीं देता। समीक्षा मंे नियंत्रण नहीं होता है सिर्फ अराजकता होती है। उपन्यास सम्राटों, काव्य सम्राटों, साहित्यिक आलोचक व समीक्षक में अराजकता होती है उनमें नियंत्रण प्रविधि नहीं होती। शोध प्रविधि को ईमानदारी से समझने और उसके पालन की आवश्यकता है। शोध प्रविधि से पूर्व शोध आलेखों को लिखने और समझने की जरूरत है।
    लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि यह वर्ष हिन्दी शोध का शताब्दी वर्ष है। 1913 में हिन्दी शोध की शुरूआत हुई थी जो इस साल 100 वर्ष पूर्ण कर लिया है। भारत मंे शोध कार्य लगभग 80 वर्ष पूर्ण कर लिया है। भारत की पहली शोध उपाधि डाॅ0 पीताम्बर भारद्वाज को प्राप्त हुई जो इसी विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य किये। लखनऊ विश्वविद्यालय में 1948 से शोध कार्य प्रारम्भ हुआ और अब तक लगभग 1000 थिसिस विश्वविद्यालय ने हिन्दी जगत को दे चुका है। उन्होंने कहा कि शोध कार्य का सीधा लाभ समाज का नहीं मिल रहा जो सोचनीय है। आज शोध कार्य बंधी बंधाई परिपाटी पर चला रहा है। विषय की रूप रेखा का चयन एक तकनीकी है और तकनीकी के अन्तर्गत कार्य करने पर ही शोध कार्य अच्छा परिणाम देता है। शोध के पाठ्यक्रम को स्नातक और परास्नातक स्तर पर शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शोध मौलिक और उपयोगी होना चाहिए और उन्हीं विषयों पर कार्य करना चाहिए जिस पर शोध सामग्री उपलब्ध हो। प्रो0 दीक्षित ने कहा कि पुनरावृत्ति में मौलिकता नहीं होती जिससे विषय का चयन बहुत ही सावधानी से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शोध के विषय को आवंटित करते समय निर्देशक सजग नहीं रहते जिससे लगभग 90 प्रतिशत शोध कहानी और उपन्यास पर ही हो रहा है। कविता में शोधार्थी रूचि नहीं ले रहे हैं जो अत्यन्त जरूरी है। आज आदान-प्रदान भाव से शोध हो रहा है जो शोध के विषय आवंटन में अराजकता है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज ज्यादातर शोध बाजार से लिखवाये जा रहे हैं ये बहुत ही गलत है और अच्छे शोध निष्कर्ष सामने नहीं आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि आवश्यकता है कि ग्राहकों की मांग के अनुसार इन विषयों पर प्रायोजित शोध कार्य कराये जायें। विदेशों में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रों में प्रायोजित शोध कार्य को ही वरीयता दी जाती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने उत्पाद की बेहतर खपत हेतु विश्वविद्यालयों को यथेष्ट वित्तीय साधन जुटाकर ‘मार्केट रिसर्च’ करवाती है।
    प्रो0 ए0एन0 सिंह, पूर्व अध्यक्ष, समाज कार्य विभाग ने कहा कि नवीनतम आयामों के आधार पर शोध प्रारम्भ करते हैं तो पूरा चक्र कम समय में कम धन व्यय ही पर शोध अच्छा हो जाता है। शोध समाज के लिए उपयोगी है इस बात का ध्यान देना चाहिए। किसी भी शोध के लिए परिकल्पना जरूरी है तभी किसी शोध का परीक्षण क्रमवार निष्कर्ष पर पहंुचेगा।
    शिक्षाशास्त्र विभाग के प्रो0 अनिल शुक्ल ने कहा कि शोध मनोवेगों से निकलता है। अलग-अलग लोग शब्दों के कई अर्थ निकालते हैं। किसी भी शोध के लिए अन्तर्वस्तु विश्लेषण जरूरी है लेकिन व्याख्या अलग होती है। धुंए मंे आग दिखाना साहित्य की प्रवृत्ति है। साहित्य शोध में आंख और कान दोनों काम करता है। कला मंे सच लम्बे समय तक रहता है। सत्य के अनंत पक्ष हैं यही आधुनिक शोध है।
    कार्यशाला के अंतिम सत्र में प्रतिभागी प्रशिक्षुओं को  विषयानुसार 5 समूहों मंे विभाजित किया गया। समूहों के विषय थे- विचारधारा, समाजिक मनोवैज्ञानिक, पाठानुसंधान, प्राचीन साहित्य, लोक साहित्य और पत्रकारिता थे। इस प्रायोगिक प्रशिक्षण द्वारा प्रशिक्षुओं को विषयानुक्रमणिका, संदर्भ ग्रंथ सूची, अध्याय विभाजन आदि से संबंधित प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया गया।
    कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो0 के0डी0 सिंह ने अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ एवं स्मृति चिन्ह प्रदान कर किया। कार्यक्रम की शुरूआत सरस्वती वंदना से हुई।

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